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Tuesday, 19 May 2026
राजनीति

अफगानिस्तान का नया कानून: चुप्पी को माना जाएगा सहमति

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Komal
संवाददाता
📅 18 May 2026, 7:31 AM ⏱ 1 मिनट 👁 244 views
अफगानिस्तान का नया कानून: चुप्पी को माना जाएगा सहमति
📷 aarpaarkhabar.com

अफगानिस्तान की तालिबान सरकार ने एक ऐसा नया कानून लागू किया है जो महिला अधिकारों के मामले में बेहद विवादास्पद साबित हो रहा है। इस कानून के तहत एक लड़की की चुप्पी को शादी की सहमति माना जाएगा। यह फैमिली लॉ शादी, तलाक, बाल विवाह जैसे कई महत्वपूर्ण विषयों को नियंत्रित करता है। इस कानून की घोषणा के बाद से अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी काफी आलोचना हो रही है क्योंकि यह कानून महिलाओं के मूल अधिकारों का उल्लंघन करता है।

तालिबान सरकार द्वारा यह कानून अपनी सख्त इस्लामिक व्यवस्था को लागू करने के लिए बनाया गया है। अफगानिस्तान में तालिबान के सत्ता में आने के बाद से महिलाओं पर कई तरह की पाबंदियां लगाई गई हैं। शिक्षा से लेकर काम करने का अधिकार, सभी क्षेत्रों में महिलाओं को प्रतिबंधित किया गया है। इस नए फैमिली लॉ को इसी श्रृंखला का एक और कदम माना जा रहा है।

चुप्पी को सहमति मानने का मतलब क्या है?

इस नए कानून के अनुसार जब किसी लड़की के विवाह के लिए प्रस्ताव दिया जाता है और वह लड़की कुछ कहती नहीं है, उसकी चुप्पी को ही शादी की सहमति माना जाएगा। यह एक बेहद खतरनाक प्रावधान है क्योंकि इससे जबरदस्ती के विवाह को कानूनी रूप दिया जा सकता है। एक लड़की चुप रह सकती है डर के कारण, घबराहट के कारण या फिर परिवार के दबाव के कारण, लेकिन इस कानून में उसकी चुप्पी को हां माना जाएगा।

महिला अधिकार कार्यकर्ताओं का मानना है कि यह प्रावधान बेहद असंवैधानिक और अमानवीय है। किसी व्यक्ति की सहमति हमेशा स्पष्ट और मौखिक होनी चाहिए, चुप्पी को सहमति नहीं माना जा सकता। यह लड़कियों को पूरी तरह से असहाय बना देता है और उन्हें अपने भविष्य का चयन करने का अधिकार नहीं देता।

अफगानिस्तान में पहले से ही बाल विवाह की समस्या बेहद गंभीर है। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार अफगानिस्तान में 40 प्रतिशत से अधिक महिलाएं 18 साल से पहले विवाह कर दी जाती हैं। यह नया कानून इस समस्या को और भी गंभीर बना सकता है क्योंकि अब परिवार वाले चुप्पी के बहाने छोटी लड़कियों की शादी करा सकते हैं।

तलाक और महिलाओं के अधिकार पर प्रभाव

इस नए फैमिली लॉ में तलाक से संबंधित प्रावधान भी बेहद महिला विरोधी हैं। कानून के अनुसार एक महिला के लिए तलाक लेना बेहद मुश्किल बना दिया गया है। दूसरी ओर, एक पुरुष को अपनी इच्छा से तलाक देने का अधिकार बना रहता है। यह भेदभाव पूरी तरह से असमान है और महिलाओं को पुरुषों के अधीन रखता है।

कानून में महिलाओं के विरासत के अधिकार को भी सीमित किया गया है। परंपरागत इस्लामिक कानून के आधार पर, महिलाओं को आधी संपत्ति का अधिकार दिया जाता है, लेकिन इस नए कानून में भी कई अपवाद जोड़े गए हैं जो महिलाओं को संपत्ति के अधिकार से वंचित कर सकते हैं।

तालिबान सरकार का दावा है कि यह कानून इस्लामिक शरीयत के अनुसार है, लेकिन विश्व के कई इस्लामिक देश भी इस तरह के सख्त कानून नहीं बनाते हैं। महिला अधिकारों की बात करने वाले संगठनों का मानना है कि धर्म के नाम पर महिलाओं का शोषण नहीं किया जा सकता।

अंतर्राष्ट्रीय प्रतिक्रिया और भविष्य की चिंताएं

इस कानून की घोषणा के बाद से संयुक्त राष्ट्र, यूरोपीय संघ और अमेरिका सहित कई देशों ने इसकी आलोचना की है। महिला अधिकार संगठनों ने इसे महिलाओं के खिलाफ अपराध बताया है। संयुक्त राष्ट्र के महिला कार्यक्रम की प्रमुख ने कहा कि यह कानून अफगानिस्तान की महिलाओं के लिए काली रात साबित होगा।

अफगानिस्तान की महिलाएं पहले से ही बेहद दकियानूसी सामाजिक व्यवस्था में जी रही हैं। तालिबान के सत्ता में आने के बाद से उनकी स्थिति और भी खराब हुई है। लड़कियों को स्कूल जाने से रोका गया है, उन्हें कई सार्वजनिक स्थानों पर जाने की मनाही है और अब यह नया कानून उनके व्यक्तिगत जीवन को भी नियंत्रित करने लगा है।

भविष्य में अफगानिस्तान की महिलाओं का क्या होगा, यह सवाल बेहद चिंताजनक है। अगर तालिबान इसी तरह सख्त कानून बनाते रहे तो अफगानिस्तान की महिलाएं पूरी तरह से असहाय हो जाएंगी। अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को अफगानिस्तान की महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए दबाव बढ़ाना चाहिए। यह केवल एक कानून नहीं है, बल्कि पूरी पीढ़ी के भविष्य का सवाल है।