बंगाल चुनाव 2026: मुस्लिम वोटर और 85 सीटों का खेल
पश्चिम बंगाल की राजनीति में मुस्लिम वोटर्स की भूमिका हमेशा से ही निर्णायक रही है। 2026 के चुनावों से पहले एक बार फिर से यह सवाल उठ रहा है कि जहां 30 प्रतिशत से अधिक मुस्लिम आबादी है, ऐसी 85 सीटों पर किसकी जीत होगी। 2021 के विधानसभा चुनावों में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस ने इन सीटों में से 75 को जीता था। इस बार का चुनावी समीकरण क्या बदलेगा, यह सवाल सभी राजनीतिक दलों के लिए महत्वपूर्ण है।
पश्चिम बंगाल की कुल 294 विधानसभा सीटों में से 85 सीटें ऐसी हैं जहां मुस्लिम आबादी 30 प्रतिशत से अधिक है। ये सीटें मुख्यतः दक्षिण बंगाल, उत्तरी और दक्षिणी 24 परगना जिलों में केंद्रित हैं। 2021 के चुनावों में जब पूरे देश में बीजेपी की लहर थी, तब भी ममता बनर्जी इन मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में अपनी पकड़ बनाए रखने में सफल रहीं।
2021 का चुनावी परिणाम और टीएमसी की जीत
2021 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में तृणमूल कांग्रेस को भारी जीत मिली थी। पार्टी ने कुल 213 सीटें जीती थीं और बीजेपी को मात दी थी। लेकिन जहां तक मुस्लिम बहुल इलाकों की बात है, तो टीएमसी की जीत का आंकड़ा और भी शानदार था। 30 प्रतिशत से अधिक मुस्लिम आबादी वाली 85 सीटों में से टीएमसी को 75 सीटें मिली थीं। यह आंकड़ा बताता है कि बंगाल के मुस्लिम समुदाय ने ममता बनर्जी और उनकी पार्टी पर कितना भरोसा किया था।
इन 75 सीटों में से अधिकांश मेट्रोपॉलिटन कोलकाता, उत्तर कोलकाता, दक्षिण कोलकाता और उपनगरीय क्षेत्रों में थीं। कुछ महत्वपूर्ण सीटें जैसे शांतिपुर, हावड़ा, उलुबेरिया और सुंदरबन क्षेत्र की सीटों में भी टीएमसी की जीत हुई थी। इन इलाकों में ममता बनर्जी की अपील और उनकी सामाजिक कल्याण योजनाओं का काफी असर दिखा था।
हालांकि, बीजेपी को भी इन इलाकों में कुछ सीटें मिली थीं। बीजेपी ने तकरीब 5-6 सीटें इन मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में जीती थीं। कांग्रेस जैसी पारंपरिक पार्टी का प्रदर्शन इन क्षेत्रों में काफी कमजोर रहा था। वामपंथी पार्टियों का प्रभाव भी लगभग खत्म हो चुका था।
2026 का चुनावी परिदृश्य और नई चुनौतियां
2026 के चुनावों में स्थिति कुछ अलग लग रही है। एक तरफ तो ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस अपनी पकड़ बनाए रखना चाहती है, तो दूसरी तरफ बीजेपी अपने प्रभाव को बढ़ाने की कोशिश कर रही है। इसके अलावा, इस बार एक नया खिलाड़ी भी मैदान में है - आल इंडिया मजलिस-ई-इत्तेहाद-उल-मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) और इस्लामिक स्टूडेंट्स फेडरेशन (आईएसएफ) जैसे पार्टियां।
आईएसएफ ने बंगाल की राजनीति में एक नया आयाम जोड़ा है। पार्टी विशेषकर युवा मुस्लिम वोटर्स को अपनी ओर आकर्षित करने की कोशिश कर रही है। आईएसएफ का कहना है कि मुस्लिम समुदाय के मुद्दों पर टीएमसी और बीजेपी दोनों ही असफल रहे हैं। इसी दावे को लेकर आईएसएफ इन मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में अपना प्रचार-प्रचार कर रही है।
कांग्रेस के पास भी अपना इतिहास है, लेकिन हाल के वर्षों में पार्टी का प्रदर्शन निराशाजनक रहा है। बंगाल में कांग्रेस की कोई मजबूत जमीन नहीं रही है। इस बार भी कांग्रेस इन मुस्लिम बहुल इलाकों में किसी बड़े प्रभाव की उम्मीद नहीं कर सकती।
वोट बिखराव और राजनीतिक गणित
2026 के चुनावों में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि मुस्लिम वोट बिखराव से क्या फायदा होगा। अगर आईएसएफ और अन्य छोटी पार्टियां भी इन इलाकों में अपना प्रचार बढ़ाते हैं, तो संभव है कि मुस्लिम वोट बंटने से टीएमसी को नुकसान हो। 2021 में टीएमसी को जो 75 सीटें मिली थीं, उनमें से कुछ सीटें इस बार जाने का खतरा है।
दूसरी तरफ, बीजेपी भी इन मुस्लिम बहुल इलाकों में अपनी पकड़ को मजबूत करना चाहती है। बीजेपी के पास विकास के मुद्दों और आर्थिक नीतियों को लेकर अपना एक विमर्श है। हालांकि, बीजेपी की साम्प्रदायिक छवि इन इलाकों में उसके लिए एक बाधा बन सकती है।
मुस्लिम आबादी के लिए शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य सेवा और सामाजिक सुरक्षा मुख्य मुद्दे हैं। जो पार्टी इन मुद्दों पर बेहतर प्रदर्शन दिखा सके, वह इन सीटों में अपनी जीत सुनिश्चित कर सकती है।
पश्चिम बंगाल के मुस्लिम वोटर्स के फैसले से ही तय होगा कि 2026 में पूरे प्रदेश की सत्ता किसके हाथ में जाएगी। ये 85 सीटें अगर टीएमसी के हाथ में रहीं, तो ममता बनर्जी फिर से सत्ता में आ सकती हैं। लेकिन अगर ये सीटें बंट गईं या बीजेपी के हाथ में चली गईं, तो पूरा समीकरण बदल सकता है। इसलिए, 2026 के बंगाल चुनावों में मुस्लिम वोटर्स का रुख किस तरफ होगा, यह सबसे महत्वपूर्ण सवाल है।




