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Thursday, 28 May 2026
अपराध

संविधान सभा: मुस्लिम सदस्यों ने गोहत्या पर बैन

author
Komal
संवाददाता
📅 28 May 2026, 5:31 AM ⏱ 1 मिनट 👁 646 views
संविधान सभा: मुस्लिम सदस्यों ने गोहत्या पर बैन
📷 aarpaarkhabar.com

भारत के संविधान के निर्माण की प्रक्रिया में कई ऐतिहासिक बहसें हुई हैं। इन बहसों में से एक गायों की हत्या से संबंधित थी। यह एक ऐसा विषय था जो धार्मिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक सभी दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण था। संविधान सभा में हुई इन बहसों के दौरान कुछ मुस्लिम सदस्यों ने भी गोहत्या पर प्रतिबंध लगाने के लिए जोरदार आवाज उठाई थी। यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण ऐतिहासिक तथ्य है जो आजकल के लोगों को पता नहीं है।

संविधान सभा की बहसों पर गहराई से नजर डालने से पता चलता है कि दो प्रमुख मुस्लिम सदस्यों ने गायों की हत्या पर राज्य के रुख को स्पष्ट रूप से परिभाषित करने की मांग की थी। इन दोनों नेताओं में से एक जहीरुल हसनैन लारी थे और दूसरे सर सैयद मोहम्मद सादुल्ला थे। यह दोनों ही नेता ऑल इंडिया मुस्लिम लीग के प्रमुख सदस्य थे। उस समय मुस्लिम लीग का राजनीतिक महत्व बहुत अधिक था और इसके सदस्यों की बात को गंभीरता से लिया जाता था।

यह बात विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि आजकल अक्सर यह कहा जाता है कि गोहत्या पर प्रतिबंध लगाने की बात सिर्फ हिंदू नेताओं ने ही उठाई थी। लेकिन ऐतिहासिक तथ्य यह बताते हैं कि इस मामले में कुछ मुस्लिम नेताओं की भी महत्वपूर्ण भूमिका थी। यह इस बात को दर्शाता है कि भारतीय समाज में गाय के प्रति सम्मान की भावना सभी धर्मों और समुदायों में मौजूद थी।

संविधान सभा में गोहत्या पर बहस

संविधान सभा में गोहत्या के प्रश्न पर काफी गर्मागर्म बहस हुई थी। इस बहस के दौरान विभिन्न सदस्यों ने अपने विचार व्यक्त किए। कुछ सदस्य गोहत्या पर पूर्ण प्रतिबंध चाहते थे, तो कुछ इसके विरुद्ध थे। लेकिन जहीरुल हसनैन लारी और सर सैयद मोहम्मद सादुल्ला जैसे मुस्लिम सदस्यों की आवाज इसी मामले में गोहत्या पर प्रतिबंध की अनुकूल थी।

जहीरुल हसनैन लारी ने इस मामले में दलील दी थी कि गोहत्या पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए। उन्होंने अपने विचारों को व्यक्त करते हुए सांस्कृतिक और धार्मिक दोनों कारणों का जिक्र किया था। उनका मानना था कि गाय केवल एक पशु नहीं है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति और समाज का एक महत्वपूर्ण अंग है। सर सैयद मोहम्मद सादुल्ला ने भी इसी तरह के विचार व्यक्त किए थे और गोहत्या पर प्रतिबंध के पक्ष में वोट दिया था।

कुरान का संदर्भ और धार्मिक दृष्टिकोण

यह बात विशेष रूप से रोचक है कि इन मुस्लिम सदस्यों ने गोहत्या पर प्रतिबंध के समर्थन में कुरान का भी संदर्भ दिया था। उन्होंने दिखाया कि इस्लाम धर्म में भी पशुओं के प्रति दया और सहानुभूति का विचार मौजूद है। कुरान में कई ऐसे अंश हैं जो पशुओं की देखभाल करने का संदेश देते हैं। इस्लामिक विचारधारा में भी जानवरों से क्रूरता करना निंदनीय माना जाता है।

जहीरुल हसनैन लारी ने अपने भाषण में इस बात को रेखांकित किया था कि कुरान में गायों को एक विशेष स्थान दिया गया है। उन्होंने कहा था कि सूरा अल-बकरा का नाम ही 'गाय' से लिया गया है, जो यह दर्शाता है कि कुरान में गायों का महत्व कितना अधिक है। उन्होंने यह भी कहा कि एक सच्चे मुसलमान को पशुओं के साथ क्रूरता नहीं करनी चाहिए। यह दृष्टिकोण पूरी तरह से इस्लामिक शिक्षाओं के अनुरूप था।

सर सैयद मोहम्मद सादुल्ला ने भी इसी प्रकार की बातें कही थीं। उन्होंने जोर दिया था कि गाय एक उपयोगी पशु है और इसकी हत्या से समाज को बड़ा नुकसान पहुंचता है। वह आर्थिक और सामाजिक दोनों दृष्टिकोण से इसके महत्व को समझते थे। उनका मानना था कि भारत जैसे कृषि प्रधान देश में गाय की सुरक्षा राज्य का कर्तव्य है।

संविधान में गोहत्या और निदेशक तत्व

अंत में, संविधान सभा की इन बहसों का परिणाम संविधान के निदेशक तत्वों में दिखाई दिया। संविधान के अनुच्छेद 48 में कृषि और पशुपालन को राज्य के लिए एक निदेशक सिद्धांत बनाया गया। इसके अंतर्गत यह कहा गया कि राज्य को कृषि और पशुपालन में सुधार करना चाहिए। साथ ही, अनुच्छेद 48-ए में गायों और अन्य दुधारू और वाहक पशुओं की नस्ल को सुधारने और उनकी वध प्रतिबंधित करने का प्रावधान किया गया।

यह प्रावधान सीधे तौर पर उन मुस्लिम सदस्यों की मांग और सुझावों का परिणाम था। संविधान सभा के सदस्यों ने समझा था कि गायों की सुरक्षा भारतीय समाज के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। इसलिए उन्होंने इसे निदेशक तत्वों में शामिल किया, जो राज्य के लिए एक दिशानिर्देश हैं, भले ही ये न्यायिक दृष्टि से बाध्यकारी न हों।

इस ऐतिहासिक तथ्य से यह स्पष्ट होता है कि भारत में गोहत्या पर प्रतिबंध का मामला सिर्फ एक धार्मिक या सांप्रदायिक विषय नहीं है। यह एक बहुआयामी मुद्दा है जो सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक और सांस्कृतिक सभी दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है। संविधान सभा में इसके बारे में जो बहस हुई, वह भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता और विविधता को दर्शाती है। विभिन्न धर्मों और विचारधाराओं के सदस्यों ने मिलकर इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर विचार किया और एक सामूहिक निर्णय लिया। यह भारतीय संविधान की सबसे बड़ी खूबसूरती है।