🔴 ब्रेकिंग
रांची छात्रों का हाई कोर्ट में विरोध, सीएम का पुतला फूंकेंगे|बक्करवाला एनकाउंटर: भाऊ गैंग के दो शूटर गिरफ्तार|आज की टॉप न्यूज: सीमा सुरक्षा और खाप समाचार|गोविंदा दूसरी शादी करने वाले थे: सुनीता आहूजा का खुलासा|पाकिस्तान से खतरा, चीन से असली टक्कर: नरवणे|यूपी शहीद परिवार छात्राओं को स्कूटी योजना|हरियाणा खाप लिव-इन रिलेशन के खिलाफ लव मैरिज समर्थक|ईरान पर अमेरिका के कड़े प्रतिबंध और चीन की भूमिका|प्याज का रस से बालों का झड़ना रोकें – जावेद हबीब का नुस्खा|UP में 9 IPS अफसरों का बड़ा तबादला, 7 जिलों के SP-SSP बदले|रांची छात्रों का हाई कोर्ट में विरोध, सीएम का पुतला फूंकेंगे|बक्करवाला एनकाउंटर: भाऊ गैंग के दो शूटर गिरफ्तार|आज की टॉप न्यूज: सीमा सुरक्षा और खाप समाचार|गोविंदा दूसरी शादी करने वाले थे: सुनीता आहूजा का खुलासा|पाकिस्तान से खतरा, चीन से असली टक्कर: नरवणे|यूपी शहीद परिवार छात्राओं को स्कूटी योजना|हरियाणा खाप लिव-इन रिलेशन के खिलाफ लव मैरिज समर्थक|ईरान पर अमेरिका के कड़े प्रतिबंध और चीन की भूमिका|प्याज का रस से बालों का झड़ना रोकें – जावेद हबीब का नुस्खा|UP में 9 IPS अफसरों का बड़ा तबादला, 7 जिलों के SP-SSP बदले|
Saturday, 03 October 2026
समाचार

कोर्ट के प्रगतिशील फैसले: लिव-इन से लेकर प्यार की आजादी तक

author
Komal
संवाददाता
📅 02 April 2026, 6:43 AM ⏱ 1 मिनट 👁 726 views
कोर्ट के प्रगतिशील फैसले: लिव-इन से लेकर प्यार की आजादी तक
📷 Aaj Tak

न्यायपालिका की नई सोच: जब अदालतों ने प्रेम को दी आजादी की संज्ञा

आज के दौर में भारतीय न्यायपालिका एक नया रुख अपनाती नजर आ रही है। वो दिन गए जब अदालतें केवल परंपरागत सोच के साथ फैसले सुनाती थीं। अब न्यायाधीश समाज में बदलते रिश्तों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को लेकर ज्यादा संवेदनशील और प्रगतिशील नजरिया अपना रहे हैं।

हाल ही में मेघालय और इलाहाबाद हाई कोर्ट के कुछ फैसलों ने इस बात को और भी स्पष्ट कर दिया है। इन फैसलों में अदालतों ने न सिर्फ लिव-इन रिलेशनशिप को कानूनी मान्यता दी है, बल्कि अंतर-जातीय प्रेम और युवाओं के प्रेम के अधिकार को भी संवैधानिक सुरक्षा प्रदान की है।

कोर्ट के प्रगतिशील फैसले: लिव-इन से लेकर प्यार की आजादी तक

लिव-इन रिलेशनशिप को मिली कानूनी मान्यता

सबसे चर्चित फैसला तब आया जब अदालत ने शादीशुदा पुरुषों के लिव-इन रिलेशनशिप को भी कानूनी दर्जा दिया। यह फैसला भले ही विवादास्पद लगे, लेकिन इसके पीछे न्यायपालिका की वो सोच है जो व्यक्तिगत स्वतंत्रता और वयस्कों के निजी फैसलों का सम्मान करती है।

अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा है कि दो वयस्क व्यक्तियों का साथ रहने का निर्णय उनकी निजी पसंद है। इस मामले में राज्य या समाज का हस्तक्षेप संविधान की मूल भावना के विपरीत है। न्यायाधीशों ने इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता का मामला बताते हुए कहा कि प्रेम करना और अपनी पसंद के व्यक्ति के साथ रहना मौलिक अधिकार है।

यह फैसला उन तमाम जोड़ों के लिए राहत की बात है जो सामाजिक दबाव के कारण अपने रिश्ते को छुपाने पर मजबूर हैं। अब वे कानूनी सुरक्षा के साथ अपना जीवन जी सकते हैं।

अंतर-जातीय प्रेम को मिला संरक्षण

भारतीय समाज में आज भी जाति के नाम पर होने वाली हिंसा एक गंभीर समस्या है। खासकर अंतर-जातीय विवाह के मामलों में युवा जोड़ों को परिवार और समाज दोनों का विरोध झेलना पड़ता है। कई बार तो इसकी कीमत उन्हें अपनी जान देकर भी चुकानी पड़ती है।

इस संदर्भ में अदालतों के हालिया फैसले बेहद महत्वपूर्ण हैं। न्यायपालिका ने साफ शब्दों में कहा है कि जाति के आधार पर किसी के प्रेम का विरोध करना संविधान विरोधी है। अनुच्छेद 21 के तहत मिले जीवन के अधिकार में प्रेम करने और अपनी पसंद के व्यक्ति से विवाह करने का अधिकार भी शामिल है।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया है कि परिवार या समाज के नाम पर किसी युवा जोड़े को परेशान करना, धमकाना या हिंसा करना दंडनीय अपराध है। पुलिस प्रशासन को निर्देश दिए गए हैं कि वे ऐसे मामलों में तत्काल कार्रवाई करें और जोड़ों की सुरक्षा सुनिश्चित करें।

युवाओं के प्रेम का अधिकार

टीनेज लव या युवाओं के प्रेम को लेकर भी समाज में तरह-तरह की भ्रांतियां हैं। कई बार माता-पिता अपनी संतानों की भावनाओं को समझने की बजाय उन्हें दबाने की कोशिश करते हैं। इससे कई बार गंभीर समस्याएं पैदा होती हैं।

अदालतों ने इस मसले पर भी प्रगतिशील रुख अपनाया है। न्यायाधीशों ने कहा है कि प्रेम एक प्राकृतिक भावना है और यह किसी भी उम्र में हो सकती है। हां, यह जरूर है कि नाबालिग बच्चों के मामले में उनकी सुरक्षा और कल्याण को ध्यान में रखना होगा।

18 साल की उम्र के बाद युवाओं को अपने भावनात्मक और व्यक्तिगत फैसले लेने का पूरा अधिकार है। परिवार का यह कर्तव्य है कि वे अपने बच्चों का साथ दें, न कि उनका विरोध करें।

समाज में बदलाव की जरूरत

ये फैसले दिखाते हैं कि हमारी न्यायपालिका समय के साथ कदम मिलाकर चल रही है। लेकिन असली चुनौती समाज की सोच बदलने में है। आज भी बहुत से लोग प्रेम-विवाह को शक की नजर से देखते हैं। जाति, धर्म और सामाजिक स्थिति के आधार पर रिश्तों का विरोध किया जाता है।

अदालतों के ये फैसले एक संदेश देते हैं कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता और प्रेम का अधिकार संविधान द्वारा संरक्षित है। किसी को भी इसमें अनुचित हस्तक्षेप का अधिकार नहीं है।

आगे की राह

भारतीय न्यायपालिका के ये प्रगतिशील फैसले निश्चित रूप से स्वागत योग्य हैं। ये न सिर्फ व्यक्तिगत स्वतंत्रता को मजबूत करते हैं, बल्कि समाज में बेहतर सोच विकसित करने में भी योगदान देते हैं। जैसे-जैसे ये फैसले लागू होंगे, उम्मीद है कि समाज भी अधिक खुले विचारों वाला और सहनशील बनेगा।

आखिर में, यह कहना गलत नहीं होगा कि प्रेम वास्तव में स्वतंत्रता का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। और जब अदालतें इसे कानूनी संरक्षण प्रदान करती हैं, तो यह लोकतंत्र की मजबूती का भी प्रमाण है।