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Saturday, 03 October 2026
राजनीति

भारत ने वापस लिया COP33 की मेजबानी का प्रस्ताव

author
Komal
संवाददाता
📅 09 April 2026, 6:16 AM ⏱ 1 मिनट 👁 940 views

भारत ने 2028 में आयोजित होने वाले COP-33 जलवायु सम्मेलन की मेजबानी का प्रस्ताव वापस ले लिया है। यह निर्णय राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2023 में इस वैश्विक जलवायु सम्मेलन को भारत में आयोजित करने का प्रस्ताव रखा था, लेकिन अब सरकार ने इस प्रस्ताव को वापस लेने का फैसला किया है।

इस निर्णय को लेकर देश में विभिन्न प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। विशेषज्ञ और पर्यावरण कार्यकर्ता इस कदम की आलोचना कर रहे हैं क्योंकि भारत ने जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर विश्व स्तर पर अपनी जिम्मेदारी दिखाने का मौका गंवा दिया है। COP सम्मेलन विश्व के सभी देशों को एक मंच पर लाता है जहां जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए महत्वपूर्ण निर्णय लिए जाते हैं।

भारत का COP-33 का प्रस्ताव और तैयारियां

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दुबई में 2023 के COP28 सम्मेलन के दौरान भारत को COP-33 की मेजबानी के लिए प्रस्तावित किया था। यह प्रस्ताव भारत के लिए गर्व की बात मानी जा रही थी क्योंकि भारत विश्व की सबसे बड़ी आबादी वाले लोकतांत्रिक देशों में से एक है। COP-33 का आयोजन 2028 में होना निर्धारित किया गया था।

इस सम्मेलन की तैयारियां भी काफी हद तक शुरू हो चुकी थीं। भारत सरकार के विभिन्न मंत्रालयों को इसके लिए निर्देश दिए गए थे। पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने इस आयोजन के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचे को विकसित करने की योजनाएं बनाई थीं। भारत के विभिन्न शहरों में सम्मेलन स्थल को तैयार करने के लिए कार्य योजना बनाई जा रही थी।

इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस सेंटर और होटल-रेस्तरां जैसी सुविधाओं को अपग्रेड करने की बात कही गई थी। हजारों विदेशी प्रतिनिधियों, पर्यावरणविदों, वैज्ञानिकों और राजनेताओं को भारत में स्वागत करने की तैयारी शुरू हो गई थी। भारत इस सम्मेलन के माध्यम से अपनी जलवायु नीति और पर्यावरणीय प्रतिबद्धता को विश्व के सामने प्रदर्शित करना चाहता था।

वापसी के पीछे के संभावित कारण

हालांकि सरकार ने प्रस्ताव को वापस लेने के लिए कोई आधिकारिक कारण नहीं दिया है, लेकिन विश्लेषकों ने कई संभावित कारणों की ओर इशारा किया है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की आर्थिक स्थिति या अन्य आंतरिक कारणों ने इस निर्णय को प्रभावित किया हो सकता है। COP सम्मेलन आयोजित करना एक महंगा प्रस्ताव है जिसमें बुनियादी ढांचे में बड़े निवेश की आवश्यकता होती है।

दूसरा, भू-राजनीतिक कारणों को भी इस निर्णय से जोड़ा जा रहा है। भारत की वर्तमान राजनीतिक स्थिति और अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में बदलाव इस कदम से संबंधित हो सकता है। पाकिस्तान के साथ तनावपूर्ण संबंध और अन्य क्षेत्रीय मुद्दों को भी संभावित कारणों में शामिल किया जा रहा है।

तीसरा कारण जलवायु परिवर्तन की वर्तमान स्थिति हो सकती है। यदि वैश्विक स्तर पर जलवायु परिवर्तन के खतरे और तीव्र हो जाते हैं, तो भारत को अपनी संसाधनों को इसे नियंत्रित करने में लगाने की आवश्यकता हो सकती है।

इसके प्रभाव और भविष्य की संभावनाएं

भारत के इस निर्णय के विश्व स्तर पर कई प्रभाव पड़ने वाले हैं। पहला, यह भारत की अंतर्राष्ट्रीय छवि को प्रभावित कर सकता है। जलवायु परिवर्तन से निपटने में भारत की प्रतिबद्धता पर सवाल उठाए जा सकते हैं। विकासशील देशों के बीच भारत की नेतृत्वकारी स्थिति कमजोर पड़ सकती है।

दूसरा, अन्य देशों को COP-33 की मेजबानी के लिए प्रस्तावित करना होगा। यह प्रक्रिया समय लेने वाली हो सकती है और नई जटिलताओं को जन्म दे सकती है। संयुक्त राष्ट्र और जलवायु परिवर्तन से संबंधित अंतर्राष्ट्रीय संगठनों को नई योजना बनानी पड़ेगी।

तीसरा, भारत के घरेलू पर्यावरण नीति और सामाजिक जिम्मेदारी पर भी सवालिया निशान लगेगा। पर्यावरण संगठन और नागरिक समाज इस निर्णय की तीव्र आलोचना कर रहे हैं।

भविष्य में, भारत अपने पर्यावरणीय लक्ष्यों को पूरा करने के लिए अन्य तरीकों को अपना सकता है। COP-33 की मेजबानी न करने का यह निर्णय अंतिम नहीं हो सकता, और भारत भविष्य में किसी अन्य COP सम्मेलन की मेजबानी के लिए फिर से प्रस्ताव रख सकता है। हालांकि, यह विश्वास को पुनः स्थापित करने के लिए भारत को अतिरिक्त प्रयास करने होंगे।