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Saturday, 04 July 2026
राजनीति

केरल PSC: 18 साल बाद नियुक्ति पत्र, रिटायरमेंट उम्र पार

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Komal
संवाददाता
📅 02 June 2026, 5:31 AM ⏱ 1 मिनट 👁 1.1K views
केरल PSC: 18 साल बाद नियुक्ति पत्र, रिटायरमेंट उम्र पार
📷 aarpaarkhabar.com

केरल लोक सेवा आयोग (पीएससी) के कार्यालय में हुई भीषण प्रशासनिक लापरवाही का शिकार एक गरीब परिवार का सपना टूट गया। यह मामला सरकारी तंत्र की नाकामियों का एक ऐसा उदाहरण है जो हर भारतीय को चिंतित करने वाला है। कालीकावु के एक अभ्यर्थी को जो नियुक्ति पत्र मिला है वह उनके जीवन का सबसे दुखद दस्तावेज बन गया है क्योंकि इसे पाते समय वह पहले से ही सरकारी नौकरी के लिए तय की गई अधिकतम उम्र सीमा पार कर चुके थे।

इस पूरे प्रकरण में केरल की राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था पर बड़े सवाल उठ रहे हैं। कैसे संभव है कि एक सरकारी आयोग किसी परीक्षा के 18 साल बाद नियुक्ति पत्र जारी करे? यह सवाल न सिर्फ इस पीड़ित अभ्यर्थी के मन में है बल्कि पूरे देश की लाखों युवाओं के लिए चिंता का विषय बन गया है जो सरकारी नौकरी की प्रतीक्षा कर रहे हैं।

प्रशासनिक अव्यवस्था का शिकार बना युवा

केरल पीएससी के कार्यालय में जो कागजी कार्यवाही हुई है वह शायद भारत के इतिहास में सबसे लंबे समय तक चली। एक अभ्यर्थी ने परीक्षा में उत्तीर्ण होने के बाद 18 साल तक इंतजार किया कि उन्हें कब नियुक्ति पत्र मिलेगा। लेकिन जब यह पत्र आया तो वह समय के सबसे गलत मुहूर्त पर आया। उस समय तक युवा अपनी जन्मतिथि के हिसाब से 60 वर्ष की आयु पार कर चुके थे।

भारतीय सरकार ने अधिकांश सरकारी नौकरियों के लिए 60 वर्ष की अधिकतम उम्र सीमा निर्धारित की है। इसका मतलब यह है कि 60 वर्ष के बाद कोई व्यक्ति सरकारी नौकरी करने के लिए योग्य नहीं माना जाता। अब इस अभ्यर्थी के सामने एक कड़वी वास्तविकता है कि उन्हें नियुक्ति पत्र तो मिल गया है लेकिन उसे स्वीकार करने का कोई सरकारी कानूनी तरीका नहीं है।

अब यह पीड़ित अभ्यर्थी अपनी जन्मतिथि के दस्तावेजों में सुधार करवाने के लिए सरकार से गुहार लगा रहे हैं। वे कम से कम एक साल की नौकरी करना चाहते हैं ताकि उन्हें सरकारी कर्मचारी का दर्जा मिल सके और उनके परिवार का यह दशकों पुराना सपना पूरा हो सके। लेकिन क्या सरकार इस मानवीय गुहार को सुनेगी? यह सवाल अभी अनुत्तरित है।

केरल पीएससी की प्रणाली में खामियां

यह घटना केरल लोक सेवा आयोग की कार्यप्रणाली में गहरी खामियों को उजागर करती है। एक लोक सेवा आयोग का प्राथमिक कर्तव्य होता है कि वह समय पर सभी नियुक्ति प्रक्रियाएं पूरी करे। परीक्षा पास करने के बाद उम्मीदवार को न्यूनतम समय में नियुक्ति पत्र मिलना चाहिए। लेकिन 18 साल की देरी किसी भी कल्पना से परे है।

इसके पीछे के कारण क्या हैं? क्या यह केवल केरल में होता है या यह पूरे भारत की समस्या है? सूचना और प्रसारण मंत्रालय की रिपोर्ट में भी कहा जाता है कि कई राज्यों में नियुक्ति प्रक्रिया अत्यंत धीमी है। लेकिन 18 साल की देरी तो सचमुच असाधारण है।

केरल की सरकार को इस मामले में सख्त कार्रवाई करनी चाहिए। जिन अधिकारियों की लापरवाही के कारण यह स्थिति पैदा हुई है उन्हें दंडित किया जाना चाहिए। साथ ही, केरल पीएससी की प्रणाली में सुधार की तत्काल जरूरत है ताकि भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा न आए।

सरकार से मानवीय रवैया की अपेक्षा

इस पीड़ित अभ्यर्थी के साथ अब तक जो कुछ हुआ है वह सरकारी तंत्र के प्रति विश्वास को झकझोर देता है। एक तरफ तो सरकार कहती है कि वह युवाओं को रोजगार देना चाहती है। दूसरी तरफ, ऐसे मामले सामने आते हैं जहां सरकारी आयोग अपनी प्रणाली की विफलता के कारण किसी का पूरा जीवन बर्बाद कर देता है।

इस अभ्यर्थी के पास एक संवैधानिक अधिकार है कि सरकार उनके साथ न्यायपूर्ण व्यवहार करे। केरल के मुख्यमंत्री और राज्य के पर्सनल विभाग को इस मामले को गंभीरता से लेना चाहिए। जन्मतिथि में संशोधन की अनुमति देना या कम से कम एक साल की नौकरी की अनुमति देना केवल न्याय का पहला कदम होगा।

यह मामला सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं है। यह पूरी सरकारी व्यवस्था के विरुद्ध एक मजबूत संदेश है कि तंत्र को कैसे सुधारा जाए। भारत को एक विकसित राष्ट्र बनने के लिए इस तरह की प्रशासनिक अव्यवस्था को खत्म करना होगा। अन्यथा, हर साल हजारों युवा इसी तरह अपने सपनों को भूलते रहेंगे।