PM की अपील vs कंपनियों की जिद: WFH पर विवाद
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ताजा अपील ने देश में एक बार फिर से 'वर्क फ्रॉम होम' को लेकर बहस छेड़ दी है। पश्चिम एशिया में जारी तनाव और बढ़ती ईंधन की कीमतों के बीच पीएम मोदी ने देश के नागरिकों से आग्रह किया है कि जहां संभव हो, वे घर से काम करें। लेकिन यह अपील जारी होते ही सोशल मीडिया पर एक तरफा बहस शुरू हो गई है, जहां कर्मचारियों का आक्रोश और कंपनियों की कठोरता दोनों ही साफ दिख रहे हैं।
इंटरनेट पर इस समय हजारों मीम्स, ट्वीट्स और पोस्ट्स वायरल हो रहे हैं जो इसी विषय को लेकर हैं। ट्विटर, इंस्टाग्राम और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर कर्मचारियों का व्यंग्य चरम पर है। लोग अपनी कंपनियों की 'ऑफिस आना अनिवार्य' नीति के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं। एक ओर तो प्रधानमंत्री ईंधन बचाने और पर्यावरण को बचाने के लिए वर्क फ्रॉम होम की सलाह दे रहे हैं, लेकिन दूसरी ओर कई बड़ी कंपनियां अपने कर्मचारियों को जबरदस्ती ऑफिस आने के लिए मजबूर कर रही हैं।
पीएम की अपील और सलाह
पीएम मोदी की यह अपील बिल्कुल ही नई नहीं है। विगत कई वर्षों से प्रधानमंत्री कार्यालय पर्यावरण संरक्षण और ऊर्जा बचत को लेकर नियमित अपीलें जारी करता रहा है। इस बार जब पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ा और तेल की कीमतें आसमान छूने लगीं, तब एक बार फिर से वर्क फ्रॉम होम पर जोर दिया गया। पीएम की दलील यह है कि अगर हर कर्मचारी घर से काम करे, तो ईंधन की बचत होगी, यातायात में भीड़ कम होगी, और प्रदूषण भी घटेगा।
यह तर्क पूरी तरह से तार्किक और जिम्मेदारीपूर्ण भी लगता है। पर्यावरण बचाने के नजरिए से देखें तो घर से काम करना निश्चित रूप से बेहतर विकल्प है। कम ट्रैफिक, कम प्रदूषण, कम पेट्रोल-डीजल खर्च - सब कुछ सकारात्मक हो जाता है। यह भी सच है कि कोविड-19 महामारी के दौरान लाखों लोगों ने साबित कर दिया कि बिना ऑफिस जाए भी उत्पादक काम किया जा सकता है। डिजिटल प्रौद्योगिकी का विकास इसे संभव बना चुका है।
कंपनियों की कठोर जिद
लेकिन अफसोस की बात यह है कि भारत की अधिकांश बड़ी कंपनियां अभी भी पुरानी सोच में फंसी हुई हैं। उन्हें लगता है कि कर्मचारी ऑफिस में न आएं, तो वे काम नहीं करेंगे। इस मानसिकता को बदलना अभी तक संभव नहीं हो पाया है। विश्व की कई बहुराष्ट्रीय कंपनियां पहले ही हाइब्रिड मॉडल या पूर्ण वर्क फ्रॉम होम की सुविधा दे रही हैं, लेकिन भारत में अभी भी ज्यादातर कंपनियां 'ऑफिस आना जरूरी है' की नीति पर कायम हैं।
इस जिद के पीछे कई कारण हो सकते हैं। पहला तो यह कि भारतीय प्रबंधन की पुरानी मानसिकता है जहां 'नजर में रहना' और 'दिखना' बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। दूसरा कारण शायद रियल एस्टेट का हो सकता है - बड़ी-बड़ी बिल्डिंगें, ऑफिस स्पेस जिसका किराया बहुत है। अगर कर्मचारी घर से काम करें, तो इन महंगे ऑफिस स्पेस का क्या होगा? तीसरा और शायद सबसे महत्वपूर्ण कारण यह है कि कंपनियों को कर्मचारियों पर पूरा नियंत्रण नहीं रहता जब वे घर से काम करते हैं।
कई आईटी कंपनियों ने तो अपने कर्मचारियों को सख्त निर्देश दे दिए हैं कि वे कम से कम सप्ताह में तीन या चार दिन ऑफिस में आया करें। कुछ कंपनियों ने तो यह नियम भी बना दिया है कि अगर कोई कर्मचारी ऑफिस में नहीं आता, तो उसे प्रमोशन नहीं मिलेगा। ऐसे में कर्मचारियों का आक्रोश स्वाभाविक है।
सोशल मीडिया पर विरोध और व्यंग्य
सोशल मीडिया पर जो कंटेंट वायरल हो रहा है, वह इसी आक्रोश की अभिव्यक्ति है। लोग अपनी कंपनियों पर व्यंग्य कर रहे हैं, मीम्स बना रहे हैं, और अपनी नाराजगी जाहिर कर रहे हैं। एक हास्य मीम में कहा जा रहा है कि 'प्रधानमंत्री जी कह रहे हैं घर से काम करो, पर बॉस साहब कह रहे हैं ऑफिस न आओ तो नौकरी से निकाल दूंगा।' यह सरल सा वाक्य असल में एक बहुत बड़ी समस्या को दर्शाता है - नीति और व्यावहारिकता के बीच खाई।
युवा कर्मचारियों के बीच भी यह बहस जोरों पर है। वे कह रहे हैं कि वे घर से बेहतर तरीके से काम कर सकते हैं, ऑफिस में बैठकर समय बरबाद करने से अच्छा है घर से उत्पादक काम करना। वे यह भी कह रहे हैं कि ऑफिस न जाना मतलब ईंधन की बचत, समय की बचत, और तनाव में भी कमी। लेकिन कंपनियां अभी भी यह समझने के लिए तैयार नहीं हैं।
यह स्थिति भारत में कार्य संस्कृति को लेकर एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा करती है। क्या हम आधुनिक विचारों को स्वीकार करने के लिए तैयार हैं? क्या कंपनियां अपनी मानसिकता को बदल सकती हैं? प्रधानमंत्री की अपील तो बहुत सही है, पर इसे लागू करने के लिए कंपनियों को भी अपनी जिद छोड़नी होगी। तब तक यह बहस सोशल मीडिया पर चलती रहेगी, मीम्स बनते रहेंगे, और कर्मचारियों का आक्रोश बढ़ता रहेगा।




