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Saturday, 04 July 2026
राजनीति

राजगढ़ में नल-जल योजना की नाकामी, प्यास का अनोखा जुगाड़

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Komal
संवाददाता
📅 23 May 2026, 6:01 AM ⏱ 1 मिनट 👁 282 views
राजगढ़ में नल-जल योजना की नाकामी, प्यास का अनोखा जुगाड़
📷 aarpaarkhabar.com

मध्य प्रदेश के राजगढ़ जिले में सरकार द्वारा चलाई जा रही नल-जल योजना की सफलता के दावे और वास्तविकता के बीच एक बहुत बड़ा अंतर देखने को मिल रहा है। शिवपुरी गांव इसका जीवंत उदाहरण बन गया है, जहां सरकार के घोषणाओं के बावजूद लोगों को पानी की समस्या का सामना करना पड़ रहा है। करोड़ों रुपये का बजट और हर घर में नल लगने के बाद भी, यहां की जनता को अपने प्यास बुझाने के लिए निजी जुगाड़ों पर निर्भर रहना पड़ रहा है।

शिवपुरी गांव की स्थिति यह है कि सरकारी पाइपलाइनें या तो सूख गई हैं या फिर उनमें से पानी आता ही नहीं है। ऐसे में गांववासियों ने अपने खेतों के कुओं में लगी पाइपलाइनों का एक पूरा जाल बना डाला है, जिसे स्थानीय लोग 'मकड़जाल' कह रहे हैं। यह जुगाड़ काफी खतरनाक भी साबित हो रहा है, लेकिन पानी की कमी के चलते लोगों के पास कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा है।

सरकारी दावे और जमीनी सच्चाई का अंतर

राजगढ़ जिले में नल-जल योजना के तहत हजारों घरों में नल लगवाए गए हैं। सरकार इस परियोजना को अत्यंत सफल बता रही है और विभिन्न आंकड़ों के साथ अपनी उपलब्धियों का ढिंढोरा पीट रही है। लेकिन जब हम शिवपुरी गांव में जाते हैं, तो यह सफलता की कहानी धराशायी हो जाती है। गांव की महिलाएं बताती हैं कि उनके नलों से महीनों से पानी नहीं आया है। कुछ घरों में तो नल लगा है, लेकिन वह सिर्फ एक निरर्थक सजावट बन गया है।

जिला प्रशासन के अनुसार, नल-जल योजना के तहत लगभग साठ प्रतिशत घर कनेक्ट हो गए हैं और पानी की आपूर्ति नियमित है। लेकिन शिवपुरी गांव के लोगों का कहना है कि यह सब झूठ है। पिछली गर्मियों में तो स्थिति इतनी गंभीर हो गई थी कि लोग अपने पशुओं के लिए भी पानी नहीं निकाल पाए थे। नलों का सूखा और कुओं का पानी—यह विरोधाभास ही शिवपुरी गांव की असली कहानी है।

पाइपों का मकड़जाल: जुगाड़ की कहानी

प्यास बुझाने का तरीका जैसे-जैसे स्पष्ट होता गया, गांववासियों ने अपने ही हाथों से समस्या का समाधान निकालने का फैसला किया। गांव के बुजुर्गों और कुछ शिक्षित युवाओं ने मिलकर एक योजना बनाई। पुरानी पाइपलाइनों को खरीदा गया, कुओं में पंप लगवाए गए और फिर एक जटिल जाल बनाया गया जो पूरे गांव में पानी पहुंचाता है।

यह 'मकड़जाल' सचमुच में एक अद्भुत दृश्य है। विभिन्न आकार की पाइपें, रस्सियों से बंधी हुई, घरों की दीवारों पर, खेतों में, पेड़ों पर—सर्वत्र लिपटी हुई हैं। कहीं-कहीं तो पाइपें इतनी उलझी हुई हैं कि किसी मकड़े के जाले जैसी लगती हैं। लेकिन इसी जुगाड़ से शिवपुरी गांव को पानी मिल रहा है। प्रतिदिन सुबह और शाम को यह निजी व्यवस्था चलाई जाती है और घरों तक पानी पहुंचाया जाता है।

गांव के प्रभाव शाली जमींदार राज सिंह ने बताया कि यह व्यवस्था करीब दो साल पहले शुरू की गई थी। शुरुआत में बहुत लोगों को इस पर विश्वास नहीं हुआ, लेकिन जब सरकारी व्यवस्था पूरी तरह विफल हो गई, तो सभी को इस जुगाड़ को अपनाना पड़ा। अब तो यह पूरे गांव की एक सामूहिक परियोजना बन गई है।

खतरनाक जुगाड़ और सरकारी लापरवाही

लेकिन इस जुगाड़ के अपने खतरे हैं। पुरानी और जंग खाई हुई पाइपें, घटिया क्वालिटी की पाइपलाइनें, और अव्यवस्थित तरीके से लगा यह पूरा ढांचा स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है। पानी की गुणवत्ता पर कोई नियंत्रण नहीं है। कई बार तो इन पाइपों में काई लग जाती है और पानी में बदबू आने लगती है। बीमारियों का खतरा भी बना रहता है।

गांव की आशा देवी कहती हैं, 'हमें पता है कि यह पानी शुद्ध नहीं है, लेकिन प्यास के आगे जगत नहीं है। क्या करें? सरकार ने हमें अकेला छोड़ दिया है।'

शिक्षक रमेश कुमार का कहना है कि सरकारी अधिकारी कभी इस गांव में आकर देखते ही नहीं कि असल में क्या हो रहा है। कागजों में सब ठीक है, बस जमीन पर कुछ भी नहीं है। यह स्थिति केवल शिवपुरी गांव तक सीमित नहीं है, बल्कि राजगढ़ जिले के कई दूसरे गांवों में भी यही समस्या देखी जा सकती है।

नल-जल योजना को सफल बनाने के लिए सरकार को न केवल अधिक निवेश करना होगा, बल्कि पारदर्शिता और जवाबदेही भी सुनिश्चित करनी होगी। शिवपुरी गांव की तरह अन्य इलाकों की भी गहराई से जांच करनी चाहिए। तभी ही इस महत्वाकांक्षी योजना को सफल बनाया जा सकता है।