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Tuesday, 19 May 2026
अपराध

ममता के करीबी पुलिस अफसर शांतनु बिस्वास गिरफ्तार

author
Komal
संवाददाता
📅 15 May 2026, 7:16 AM ⏱ 1 मिनट 👁 1.1K views
ममता के करीबी पुलिस अफसर शांतनु बिस्वास गिरफ्तार
📷 aarpaarkhabar.com

पश्चिम बंगाल की राजनीति और पुलिस महकमे में तूफान खड़ा हो गया है। कोलकाता पुलिस के डिप्टी कमिश्नर (DC) शांतनु सिन्हा बिस्वास की प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा की गई गिरफ्तारी ने पूरे प्रदेश में बहस का मुद्दा बना दिया है। पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के करीबी माने जाने वाले इस पुलिस अधिकारी पर जमीन हड़पने और संगठित वसूली रैकेट चलाने के अत्यंत गंभीर आरोप हैं। यह मामला न केवल पश्चिम बंगाल की पुलिस व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है, बल्कि राजनीतिक हलकों में भी गहरी चिंता का कारण बना है।

शांतनु बिस्वास का नाम कई विवादास्पद मामलों से जुड़ा हुआ है। उन पर लगाए गए आरोपों में जमीन को गैरकानूनी तरीके से हड़पना, जनता से वसूली रैकेट चलाना और सरकारी अधिकारियों का दुरुपयोग करके निजी लाभ कमाना शामिल है। प्रवर्तन निदेशालय की तरफ से उनके खिलाफ संचालित जांच में इन सभी आरोपों को लेकर विस्तृत साक्ष्य मिले हैं। बताया जा रहा है कि बिस्वास ने अपनी पद की शक्ति का उपयोग करके कई लोगों की जमीन अवैध तरीके से अपने नाम करवा ली थी।

ममता के करीबी अधिकारी का विवादास्पद करियर

शांतनु बिस्वास को लंबे समय से ममता बनर्जी के करीबी होने के लिए जाना जाता रहा है। उनका राजनीतिक संरक्षण उन्हें कई विवादास्पद मामलों से बचाता रहा। पश्चिम बंगाल पुलिस में उनकी तरक्की में भी राजनीतिक हस्तक्षेप की बातें होती रही हैं। कोलकाता पुलिस कमिश्नर के दफ्तर में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका के दौरान कई ऐसी घटनाएं सामने आई हैं जो उनकी कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करती हैं।

इस गिरफ्तारी से पहले भी बिस्वास के खिलाफ कई शिकायतें दर्ज की गई थीं। नागरिक अधिकार समूहों और पत्रकारों ने उनके खिलाफ भूमि अधिग्रहण और भ्रष्टाचार के मामले उजागर किए थे। हालांकि, पश्चिम बंगाल की स्थानीय पुलिस प्रशासन पर इन शिकायतों का कोई विशेष असर नहीं पड़ा। लेकिन जब केंद्रीय जांच एजेंसी ED ने इस मामले को हाथ में लिया, तो परिस्थितियां तेजी से बदलने लगीं।

प्रवर्तन निदेशालय की कार्रवाई और उसके प्रभाव

प्रवर्तन निदेशालय की इस कार्रवाई से पश्चिम बंगाल की राजनीति में हलचल मच गई है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह गिरफ्तारी न केवल एक व्यक्तिगत मामला नहीं है, बल्कि पूरे पुलिस तंत्र की पारदर्शिता के बारे में सवाल उठाती है। बिस्वास जैसे उच्च पद पर बैठे अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई से यह संदेश जाता है कि कानून सभी के लिए समान है, चाहे वह कितना भी प्रभावशाली व्यक्ति क्यों न हो।

ED की जांच में पाया गया कि बिस्वास ने कई दशकों में अपनी पद के दुरुपयोग से अकूत संपत्ति जमा की है। उनके नाम पर कोलकाता और आसपास के क्षेत्रों में कई मूल्यवान संपत्तियां दर्ज हैं, जिनकी उत्पत्ति संदेहास्पद है। जांच एजेंसी के अनुसार, ये संपत्तियां अवैध भूमि हड़पने और वसूली रैकेट से प्राप्त की गई हैं। बिस्वास के बैंक खातों में भी बड़ी रकम पाई गई है, जिसका कोई स्पष्ट स्रोत नहीं है।

राज्य के मुख्य सचिव ने इस मामले में एक आधिकारिक बयान दिया है, जिसमें उन्होंने कहा है कि पुलिस विभाग भी इस घटना से स्तब्ध है। उन्होंने यह भी कहा कि पुलिस महकमे के अंदर भी सुधार की आवश्यकता है ताकि भविष्य में ऐसी घटनाएं न हों। साथ ही, केंद्रीय जांच एजेंसी की सराहना की गई है कि उसने पूरी जांच में पारदर्शिता बनाए रखी है।

सामाजिक प्रभाव और जनता की प्रतिक्रिया

इस घटना से आम जनता में काफी असंतोष व्यक्त हुआ है। पश्चिम बंगाल के विभिन्न हिस्सों में लोगों ने अपनी-अपनी जमीन से संबंधित शिकायतें दर्ज की हैं, जिनमें बिस्वास की भूमिका का संदेह है। नागरिक समूहों ने मांग की है कि पूरी पुलिस व्यवस्था की समीक्षा की जानी चाहिए और जो भी अधिकारी भ्रष्टाचार में लिप्त हैं, उन्हें कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए।

मीडिया ने भी इस मामले को व्यापक कवरेज दिया है। पत्रकार संगठनों ने कहा है कि बिस्वास की गिरफ्तारी से साबित होता है कि सत्य आखिरकार सामने आता है। हालांकि, कुछ राजनीतिक दल इस कार्रवाई को लेकर विभाजित राय रखते हैं। विरोधी दलों ने इसे राजनीतिक दमन का हिस्सा बताया है, जबकि कुछ लोगों का मानना है कि यह न्याय की सही दिशा में एक कदम है।

इस पूरे मामले का असर पश्चिम बंगाल की राजनीति पर पड़ना निश्चित है। भविष्य में, पुलिस विभाग के अंदर पारदर्शिता और जवाबदेही के मुद्दे पर अधिक जोर दिया जाएगा। शांतनु बिस्वास की गिरफ्तारी एक चेतावनी है कि चाहे कोई कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो, कानून और न्याय के समक्ष सभी समान हैं।