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Sunday, 05 July 2026
राजनीति

सिद्धारमैया बनाम शिवकुमार: कर्नाटक में सत्ता परिवर्तन

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Komal
संवाददाता
📅 27 May 2026, 6:01 AM ⏱ 1 मिनट 👁 1.1K views
सिद्धारमैया बनाम शिवकुमार: कर्नाटक में सत्ता परिवर्तन
📷 aarpaarkhabar.com

कर्नाटक की कांग्रेस सरकार में नेतृत्व परिवर्तन को लेकर जो सस्पेंस बना हुआ है वह अब तक हल नहीं हुआ है। दिल्ली में हाल ही में हुई महत्वपूर्ण बैठक में राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खरगे, सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार एक दूसरे के साथ गहन विचार विमर्श करते हुए नजर आए। हालांकि कांग्रेस पार्टी ने अभी तक सार्वजनिक तौर पर किसी भी नेतृत्व परिवर्तन की घोषणा नहीं की है, लेकिन राज्य की राजनीति में होने वाली हलचलों से यह साफ है कि कोई बड़ा फैसला होने वाला है। कर्नाटक की राजनीति में मौजूदा माहौल को समझने के लिए हमें इस पूरे मामले को विस्तार से समझना होगा।

कर्नाटक में कांग्रेस की आंतरिक कशमकश

कर्नाटक कांग्रेस में सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार की राजनीतिक कद्दावर मौजूदगी के बीच सत्ता के समीकरण को लेकर हमेशा से ही बातचीत होती रहती है। सिद्धारमैया वर्तमान में मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे हैं, लेकिन पार्टी के भीतर डीके शिवकुमार की ताकत और उनके समर्थकों की संख्या भी कम नहीं है। कर्नाटक की राजनीति को समझने वालों के अनुसार यह संघर्ष आंतरिक रूप से काफी समय से चल रहा है। शिवकुमार खेमे का मानना है कि वह पार्टी के योगदान और जमीनी काम के लिहाज से मुख्यमंत्री पद के योग्य हैं।

दूसरी ओर, सिद्धारमैया की पृष्ठभूमि और उनका अनुभव भी अतुलनीय है। वह पहले भी कर्नाटक के मुख्यमंत्री रह चुके हैं और उनके पास लंबा राजनीतिक अनुभव है। इन दोनों नेताओं के बीच की खींचतान कर्नाटक कांग्रेस के लिए एक बड़ी चुनौती बन गई है। पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व को इस मामले को सुलझाने के लिए सक्रिय होना पड़ रहा है।

हाल ही में दिल्ली में हुई बैठक के दौरान पार्टी के शीर्ष नेताओं ने इस पूरी स्थिति पर विस्तार से चर्चा की। राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे को पार्टी के भीतर इस तनाव को समझना और उसका समाधान निकालना था। बैठक के दौरान विभिन्न विकल्पों पर बातचीत हुई। कुछ स्रोतों के अनुसार सिद्धारमैया को केंद्रीय राजनीति में किसी महत्वपूर्ण भूमिका दिए जाने का प्रस्ताव भी सामने आया।

राज्यसभा चुनाव के बाद बड़ा फैसला की संभावना

कांग्रेस के सूत्रों का कहना है कि कर्नाटक से होने वाले राज्यसभा चुनावों के बाद पार्टी कोई बड़ा फैसला ले सकती है। इस चुनाव में कांग्रेस के लिए कुछ सीटें सुरक्षित मानी जा रही हैं और पार्टी इन सीटों पर अपने भरोसेमंद नेताओं को भेजना चाहती है। राज्यसभा चुनाव एक महत्वपूर्ण जनचुनाव होगा और इसके परिणामों का असर कर्नाटक की राजनीति पर भी पड़ेगा।

चुनाव के बाद पार्टी नेतृत्व के पास अधिक लचीलापन होगा। अगर कांग्रेस को राज्यसभा में अपनी स्थिति मजबूत करने का अवसर मिलता है तो वह कर्नाटक में नेतृत्व परिवर्तन का फैसला ले सकती है। कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह सबसे उपयुक्त समय होगा जब पार्टी इस तरह का बड़ा फैसला ले सकेगी।

शिवकुमार के समर्थकों का मानना है कि पार्टी में उनका दबदबा काफी मजबूत है और उन्हें मुख्यमंत्री पद दिए जाने की मांग पूरी तरह न्यायसंगत है। दूसरी ओर, सिद्धारमैया के खेमे का तर्क है कि सत्ता में सुचारू चलाने के लिए अनुभव जरूरी है और सिद्धारमैया के पास यह है।

सिद्धारमैया को केंद्रीय राजनीति में भूमिका का फॉर्मूला

कांग्रेस पार्टी के भीतर एक ऐसे फॉर्मूले पर भी विचार किया जा रहा है जिसमें सिद्धारमैया को केंद्रीय राजनीति में किसी महत्वपूर्ण भूमिका दी जा सकती है। पार्टी के शीर्ष नेतृत्व का मानना है कि अगर सिद्धारमैया को दिल्ली में कांग्रेस की राजनीति में कोई महत्वपूर्ण स्थान दिया जाता है तो यह पार्टी के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है।

सिद्धारमैया को संसद में कांग्रेस के नेता या किसी अन्य महत्वपूर्ण राष्ट्रीय भूमिका में नियुक्त किया जा सकता है। इस तरह की व्यवस्था से शिवकुमार को कर्नाटक में मुख्यमंत्री पद दिया जा सकता है और सिद्धारमैया को भी सम्मानपूर्ण पद प्रदान किया जा सकता है। यह एक ऐसा समाधान है जो दोनों पक्षों को संतुष्ट कर सकता है।

हालांकि पार्टी ने अब तक कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की है, लेकिन राजनीतिक मंचों में इस तरह की चर्चाएं जोरों पर हैं। कर्नाटक की जनता भी इस विकास को काफी गहराई से देख रही है क्योंकि इससे राज्य की सरकार की नीतियों और काम के तरीके पर असर पड़ सकता है।

कुल मिलाकर, कर्नाटक कांग्रेस में नेतृत्व परिवर्तन को लेकर जो सस्पेंस है वह राज्यसभा चुनावों के बाद सुलझने की संभावना है। पार्टी के शीर्ष नेतृत्व इस मामले को बुद्धिमानी के साथ संभालने की कोशिश कर रहे हैं ताकि पार्टी की एकता भी बनी रहे और दोनों नेता भी संतुष्ट रहें। आने वाले समय में कर्नाटक की राजनीति में और भी बदलाव देखने को मिल सकते हैं।