पूर्वी दिल्ली की वेलकम झील: सरकारी पैसे की बर्बादी
पूर्वी दिल्ली की वेलकम झील का किस्सा सरकारी लापरवाही और सार्वजनिक संसाधनों की बर्बादी का एक चिंताजनक उदाहरण है। करोड़ों रुपये की सार्वजनिक निधि से निर्मित यह झील आज एक सूखे मैदान में तब्दील हो गई है, जहां स्थानीय निवासी और युवा क्रिकेट खेलते हैं। यह दृश्य न केवल सरकार की विफलता को दर्शाता है, बल्कि उस प्रणाली की खामियों को भी उजागर करता है जो जनता के पैसे का सही उपयोग नहीं कर पाती।
वेलकम झील का निर्माण और खस्ता हाल
वेलकम झील का निर्माण दिल्ली के जल संसाधन विभाग द्वारा जलभराव की समस्या को दूर करने और पर्यावरण संरक्षण के उद्देश्य से किया गया था। परियोजना को स्वीकृति देते समय सरकार ने दावा किया था कि यह झील न केवल पानी की कमी को पूरा करेगी, बल्कि इस क्षेत्र का पर्यावरणीय संतुलन भी बनाए रखेगी। स्थानीय निवासियों को भी आश्वासन दिया गया था कि यह झील मनोरंजन और जल संरक्षण दोनों का काम करेगी।
हालांकि, निर्माण के कई वर्षों बाद स्थिति कुछ और ही बयां करती है। झील में न तो पानी है और न ही कोई जलीय वनस्पति। बारिश के मौसम में भी पानी ठहरता नहीं रहता। गर्मी के दिनों में तो पूरा क्षेत्र एकदम सूख जाता है। अब इस सूखे मैदान पर स्थानीय लड़के और पड़ोस के खिलाड़ी क्रिकेट खेलते हैं। कुछ स्थानों पर मिट्टी इतनी सूख गई है कि धूल भी उड़ने लगती है।
असफल परियोजना के पीछे के कारण
झील की इस दुर्दशा के पीछे कई कारण हैं। सबसे पहली समस्या है खराब इंजीनियरिंग और डिजाइन। विशेषज्ञों का कहना है कि झील का निर्माण करते समय उचित भूजल सर्वेक्षण नहीं किया गया। क्षेत्र की जलवहन क्षमता (वाटर होल्डिंग कैपेसिटी) को सही तरीके से परिकलित नहीं किया गया, जिससे जो पानी बरसता है, वह जमीन में रिस जाता है।
दूसरी बड़ी समस्या है अनुचित रखरखाव। झील की साफ-सफाई और रक्षरक्षा के लिए जो बजट निर्धारित किया गया था, वह सही तरीके से खर्च नहीं हुआ। स्थानीय निवासियों का कहना है कि कुछ समय के लिए तो विभाग ने इसकी सफाई भी करवाई, लेकिन फिर सब कुछ भूल गए। अब तो कोई भी नियमित आधार पर इसकी देखभाल नहीं करता।
तीसरा कारण है प्रशासनिक लापरवाही और जवाबदेही की कमी। न तो कोई अधिकारी इस परियोजना की विफलता के लिए जिम्मेदारी लेता है, न ही कोई सुधारात्मक कदम उठाया जाता है। जब स्थानीय निवासियों ने शिकायतें दर्ज कीं, तो फाइलें सिर्फ एक विभाग से दूसरे विभाग तक भटकती रहीं, लेकिन कोई समाधान नहीं निकला।
जनता के पैसे की बर्बादी
आरटीआई आवेदन के माध्यम से प्राप्त जानकारी के अनुसार, वेलकम झील की परियोजना पर कुल चौदह करोड़ से अधिक रुपये खर्च किए गए थे। यह राशि केवल निर्माण के लिए थी। इसके अलावा डिजाइन, सर्वेक्षण और अन्य प्रशासनिक कार्यों पर भी लाखों रुपये खर्च हुए। अगर पिछली पाँच वर्षों का रखरखाव और मरम्मत खर्च भी जोड़ा जाए, तो कुल राशि बीस करोड़ रुपये से भी अधिक हो जाती है।
इतने विशाल बजट के बाद भी परियोजना पूरी तरह असफल साबित हुई। इस राशि का एक बड़ा हिस्सा फिजूलखर्ची का शिकार बन गया। स्थानीय निवासियों के अनुसार, निर्माण के समय ठेकेदारों द्वारा घटिया सामग्री का उपयोग किया गया था। कुछ काम ठीक तरीके से पूरे ही नहीं हुए। मिट्टी की खुदाई के दौरान भारी मात्रा में पत्थर निकले, जिन्हें हटाने में अतिरिक्त खर्च आया।
आम आदमी को भुगतनी पड़ी कीमत
इस परियोजना की विफलता का सबसे बड़ा नुकसान आम लोगों को हुआ है। इस क्षेत्र के निवासियों को जो लाभ दिए जाने का वादा किया गया था, वह कभी नहीं मिले। बारिश के मौसम में जहां झील में पानी जमा होना चाहिए था, वहां भी जल निकासी ठीक से नहीं हो पाई है। कुछ इलाकों में तो जलभराव की समस्या उल्टे बढ़ गई है।
पर्यावरणीय नुकसान भी काफी है। जहां एक समृद्ध जलीय पारिस्थितिकी तंत्र बनना चाहिए था, वहां केवल रेतीला और सूखा मैदान रह गया है। पक्षियों के आने की संख्या भी कम हुई है। जो वनस्पति लगाई गई थी, वह भी सूख गई। इसका मतलब है कि न केवल आर्थिक नुकसान हुआ है, बल्कि पर्यावरण को भी नुकसान पहुँचा है।
भविष्य का सवाल
इस समय सवाल यह है कि क्या इस परियोजना को दोबारा से ठीक किया जा सकता है? विशेषज्ञों का कहना है कि अगर सही तकनीकी हस्तक्षेप किया जाए और उचित योजना बनाई जाए, तो इसे पुनर्जीवित किया जा सकता है। लेकिन इसके लिए अतिरिक्त निवेश की आवश्यकता होगी। दिल्ली सरकार को चाहिए कि वह एक स्वतंत्र तकनीकी समिति गठित करे, जो इस परियोजना की विफलता की गहनता से जांच करे और सुधार के तरीके सुझाए।
इसके अलावा, जिन अधिकारियों और ठेकेदारों की लापरवाही से यह परियोजना विफल हुई, उनके विरुद्ध कार्रवाई होनी चाहिए। यह जनता के पैसे की बर्बादी है और इसके लिए कोई भी जवाबदेह नहीं है। अगर इस तरह की लापरवाही को रोका नहीं गया, तो भविष्य में भी ऐसी परियोजनाएं असफल होती रहेंगी।
वेलकम झील का यह खस्ता हाल दिल्ली प्रशासन के लिए शर्मनाक है। यह दिखाता है कि सार्वजनिक निधि का प्रबंधन कितनी लापरवाही से किया जाता है। जब तक इस प्रणाली में सुधार नहीं होगा और जवाबदेही सुनिश्चित नहीं की जाएगी, तब तक ऐसी घटनाएं होती रहेंगी। आज की तारीख में जरूरत है कि दिल्ली के सभी नागरिक मिलकर सरकार से मांग करें कि वह इस झील को पुनर्जीवित करे और भविष्य में ऐसी लापरवाही नहीं होगी, इसका आश्वासन दे।



