मिडिल ईस्ट युद्ध का असर: फूड प्राइस 6 महीने के हाई पर
मिडिल ईस्ट युद्ध का खतरनाक असर: 40 दिन बाद और भी बिगड़ सकते हैं हालात
मिडिल ईस्ट में जारी संघर्ष ने पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को हिलाकर रख दिया है। अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच चल रहे युद्ध का सबसे गंभीर असर ग्लोबल फूड प्राइसेज पर देखने को मिल रहा है। संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, खाद्य पदार्थों की कीमतें 6 महीने के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गई हैं। इससे भी चिंताजनक बात यह है कि अर्थशास्त्रियों का कहना है कि अगर यह युद्ध 40 दिन से ज्यादा चला तो स्थिति और भी खराब हो सकती है।
होर्मुज जलडमरूमध्य बंद होने का व्यापक प्रभाव
युद्ध का सबसे बड़ा असर होर्मुज जलडमरूमध्य पर पड़ा है, जो दुनिया के तेल परिवहन के लिए एक महत्वपूर्ण रास्ता है। इस रूट के बंद होने से ग्लोबल ऑयल क्राइसिस पैदा हुआ है, जिसका सीधा प्रभाव खाद्य पदार्थों की कीमतों पर दिखाई दे रहा है। तेल की बढ़ती कीमतों के चलते ट्रांसपोर्टेशन की लागत बढ़ गई है, जिससे सभी जरूरी सामान महंगे हो गए हैं।

पाकिस्तान, बांग्लादेश, और श्रीलंका जैसे देश इस संकट से सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं। ये देश अपनी खाद्य जरूरतों के लिए काफी हद तक आयात पर निर्भर हैं, और मौजूदा स्थिति में उन्हें भारी कीमत चुकानी पड़ रही है। भारत भी इस संकट से अछूता नहीं रहा है, यहां भी कई आवश्यक वस्तुओं की कीमतें बढ़ने लगी हैं।
FAO की चेतावनी और आंकड़े
| महीना | फूड प्राइस इंडेक्स | पिछले महीने से बदलाव |
| ------- | ----------------- | -------------------- | |
|---|---|---|---|
| सितंबर 2025 | 128.4 | +2.8% | |
| अक्टूबर 2025 | 132.1 | +2.9% | |
| नवंबर 2025 | 135.7 | +2.7% | |
| दिसंबर 2025 | 139.2 | +2.6% | |
| जनवरी 2026 | 143.8 | +3.3% | |
| फरवरी 2026 | 148.5 | +3.3% |
FAO के चीफ इकोनॉमिस्ट डॉ. मार्को सांचेज मारिनेली का कहना है कि सितंबर 2025 के बाद से ग्लोबल फूड प्राइसेज में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। उनके मुताबिक, "अगर मिडिल ईस्ट का यह संघर्ष 40 दिन से ज्यादा चला तो हम एक गंभीर खाद्य संकट का सामना कर सकते हैं।" उन्होंने चेतावनी दी है कि लंबे समय तक चलने वाले युद्ध से न केवल तेल की कमी होगी, बल्कि कृषि उत्पादों की आपूर्ति श्रृंखला भी बुरी तरह प्रभावित होगी।
कौन से खाद्य पदार्थ सबसे ज्यादा प्रभावित
मौजूदा संकट में अनाज, दाल, और खाद्य तेल की कीमतें सबसे ज्यादा बढ़ी हैं। गेहूं की कीमत पिछले 6 महीने में 18% तक बढ़ गई है, जबकि चावल और मक्का की कीमतों में भी 12-15% का इजाफा हुआ है। खाना पकाने के तेल की कीमतें तो 25% तक बढ़ गई हैं, जो आम लोगों के लिए एक बड़ी समस्या बन गई है।
सब्जियों और फलों की कीमतें भी आसमान छू रही हैं। ट्रांसपोर्टेशन की बढ़ी हुई लागत के चलते दूसरे देशों से आने वाले फल-सब्जी 20-30% तक महंगे हो गए हैं। डेयरी प्रोडक्ट्स की कीमतों में भी इजाफा हुआ है क्योंकि पशु आहार महंगा हो गया है।
भारत पर प्रभाव और सरकारी तैयारी
भारत सरकार इस स्थिति से निपटने के लिए कई कदम उठा रही है। खाद्य मंत्रालय के अधिकारियों का कहना है कि सरकारी गोदामों में पर्याप्त अनाज का भंडार है, लेकिन तेल और दाल के मामले में चुनौतियां हैं। सरकार ने आयात शुल्क को घटाने और स्थानीय उत्पादन बढ़ाने की योजना बनाई है।
वित्त मंत्रालय के सूत्रों का कहना है कि अगर युद्ध लंबे समय तक चला तो सब्सिडी बढ़ानी पड़ सकती है। प्रधानमंत्री कार्यालय की एक बैठक में इस मुद्दे पर चर्चा हुई है और आपातकालीन उपायों की तैयारी की जा रही है।
आगे की चुनौतियां और समाधान
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि अगर यह संकट और गहराया तो विकासशील देशों में भुखमरी और सामाजिक अशांति का खतरा बढ़ सकता है। विश्व बैंक ने भी अपनी रिपोर्ट में कहा है कि खाद्य महंगाई गरीब देशों के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन सकती है।
इस संकट से निपटने के लिए अंतर्राष्ट्रीय सहयोग की जरूरत है। विशेषज्ञों का सुझाव है कि वैकल्पिक आपूर्ति रूट विकसित करने होंगे और स्थानीय उत्पादन को बढ़ावा देना होगा। साथ ही, रणनीतिक भंडारण व्यवस्था को मजबूत बनाना होगा ताकि भविष्य में ऐसी स्थितियों से बेहतर तरीके से निपटा जा सके।
फिलहाल तो दुनिया भर की निगाहें मिडिल ईस्ट की स्थिति पर टिकी हुई हैं। उम्मीद है कि जल्द ही शांति बहाली हो और ग्लोबल फूड सिक्योरिटी को लेकर पैदा हुई चिंताएं दूर हों।




