दीपिका और ट्विशा की मौत: दहेज प्रथा का काला सच
ग्रेटर नोएडा की दीपिका और भोपाल की ट्विशा शर्मा की मौत ने एक बार फिर दहेज प्रथा की भयावह सच्चाई को हमारे सामने ला दिया है। ये दोनों घटनाएं केवल आंकड़े नहीं हैं, बल्कि हमारे समाज की विफलता की गवाही हैं। जब हम सोचते हैं कि शिक्षा और आर्थिक समृद्धि के इस दौर में दहेज जैसी कुप्रथा खत्म हो गई होगी, तब ये दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएं हमें कड़वी सच्चाई से रूबरू करती हैं।
दीपिका का परिवार शिक्षित था। ट्विशा के माता-पिता संपन्न थे। दोनों परिवारों ने अपनी बेटियों को अच्छी शिक्षा दी थी। दोनों ने ससुराल में एक सामान्य जीवन की आशा की थी। लेकिन दहेज की लालच ने इन सभी उम्मीदों को तार-तार कर दिया। प्रश्न यह है कि क्या शिक्षा और संपत्ति दहेज जैसी कुरीति को रोकने के लिए पर्याप्त है? आजकल की सच्चाई तो यह है कि शिक्षित परिवारों में भी दहेज की मांग उतनी ही कठोर और निर्दय होती है।
दहेज का जहर कितना गहरा है?
भारत में दहेज का विषय केवल पैसे या सामान तक सीमित नहीं है। यह एक सामाजिक विकार है जो पीढ़ियों से चला आ रहा है। जब किसी लड़की का विवाह होने वाला है, तो उसके परिवार पर एक अदृश्य दबाव बन जाता है। न केवल दहेज देने का दबाव, बल्कि यह भी कि समाज में सिर ऊंचा करके चलना है। दीपिका और ट्विशा की मृत्यु के पश्चात् ससुराल के लोग क्या कहते हैं, इस बात की कोई परवाह नहीं करते। परिवार के सदस्य, पड़ोसियों और रिश्तेदारों की नकारात्मक टिप्पणियों से बचने के लिए माता-पिता अपनी बेटियों को जो भी चाहे दहेज दे देते हैं।
वर्तमान समय में दहेज केवल नकद राशि नहीं रहा है। घर के सामान से लेकर कार, बाइक, गहने और यहां तक कि विदेश की यात्रा भी दहेज के नाम पर मांगी जाती है। यदि किसी परिवार के पास इतनी क्षमता नहीं है, तो दुल्हन को उसके ससुराल में प्रताड़ना का सामना करना पड़ता है। यही दहेज का जहर है जो धीरे-धीरे एक महिला के जीवन को निगल जाता है।
समाज की जिम्मेदारी और भूमिका
दीपिका और ट्विशा की मौत का सबसे बड़ा जिम्मेदार हमारा समाज है। हां, उनके ससुराल वाले जिम्मेदार हैं। हां, दहेज की मांग करने वाले दोषी हैं। लेकिन असली समस्या यह है कि हम सब मिलकर इस प्रथा को जीवंत रखते हैं। हर बार जब कोई पड़ोसी अपनी बेटी को बिना दहेज दिए शादी नहीं करने देता, तो समाज में एक संदेश जाता है कि दहेज जरूरी है। हर बार जब कोई माता-पिता अपनी क्षमता से अधिक दहेज दे देते हैं, तो एक नया मानदंड स्थापित होता है।
समाज में ऐसे लोग भी हैं जो दहेज के विरुद्ध खुलकर बोलते हैं, लेकिन वे अल्पसंख्यक हैं। जब कोई युवक बिना दहेज के विवाह करता है, तो समाज उसे अलग नजरिए से देखता है। दहेज प्रथा के खिलाफ लड़ाई केवल कानून के माध्यम से नहीं लड़ी जा सकती। इसे समाज की सोच बदलकर लड़ना होगा। जब तक हम अपने घरों में, अपने मुहल्लों में और अपने मित्र मंडली में दहेज के खिलाफ एक मजबूत संदेश नहीं देते, तब तक दीपिका और ट्विशा जैसी घटनाएं बार-बार होती रहेंगी।
कानून, शिक्षा और चेतना
भारत में दहेज निषेध अधिनियम, 1961 एक कानून है, लेकिन इसका पालन कितना होता है यह सवाल खुद में अपना जवाब रखता है। हजारों मामलों में दहेज हिंसा या दहेज से संबंधित मौतें दर्ज होती हैं, पर सजा के मामले बहुत कम हैं। न्याय व्यवस्था की धीमी गति और सबूतों की कमी के कारण अक्सर दोषियों को सजा नहीं मिलती। दीपिका और ट्विशा के परिवार को न्याय मिले, यह आवश्यक है, लेकिन उससे भी अधिक आवश्यक है कि समाज का चेतना जागरण हो।
शिक्षा दहेज प्रथा के खिलाफ एक महत्वपूर्ण हथियार है। स्कूलों और कॉलेजों में लड़कियों को सशक्त बनाने की शिक्षा दी जानी चाहिए। लड़कों को सिखाया जाना चाहिए कि दहेज लेना न केवल कानूनन अपराध है, बल्कि यह मानवता के खिलाफ है। परिवारों को यह समझना होगा कि दहेज देकर अपनी बेटी को खतरे में डालना एक तरह की आत्महत्या है।
दीपिका की मां-बाप और ट्विशा के माता-पिता आज अपनी बेटियों के लिए रोते हैं। उनका दर्द अमाप है। लेकिन अगर हम सब मिलकर दहेज प्रथा के खिलाफ एक मजबूत मोर्चा खड़ा न करें, तो यह दर्द किसी और परिवार को भी भुगतना पड़ेगा। समाज को बदलना है तो हमें अपने-अपने घरों से शुरुआत करनी होगी। हर माता-पिता को यह संकल्प लेना होगा कि वे अपनी बेटी को दहेज के साथ नहीं, बल्कि शिक्षा, आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता के साथ भेजेंगे। तभी दीपिका और ट्विशा की मौत सार्थक होगी।




