99 परसेंटाइल, 25 लाख खर्च, फिर भी नहीं मिलेगा IIT
भारत में हर साल लाखों किशोर आईआईटी (इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी) का सपना देखते हैं। माता-पिता अपनी जेब खाली कर देते हैं, छात्र दिन-रात मेहनत करते हैं, लेकिन क्या ये सब कुछ काफी है? इस साल का डेटा जो सामने आया है वह बेहद चिंताजनक है। 99 परसेंटाइल स्कोर करने वाले छात्रों को भी आईआईटी में दाखिला नहीं मिल रहा है। साथ ही, कोचिंग पर खर्च 25 लाख रुपये तक पहुंच गया है। क्या भारत की सबसे प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग परीक्षा अब महज एक महंगी लॉटरी बनकर रह गई है? आइए इसी विषय पर विस्तार से चर्चा करते हैं।
परफेक्ट स्कोर पर भी निराशा
इस साल जेईई मेन परीक्षा के परिणाम घोषित हुए तो आश्चर्यजनक खबरें सामने आईं। 26 छात्रों ने परफेक्ट 100 परसेंटाइल हासिल किया। यानी, उन्होंने पूरी परीक्षा में सबसे अधिक अंक प्राप्त किए। लेकिन समस्या यह है कि आईआईटी में केवल 16 हजार सीटें हैं। जब 30 हजार से अधिक छात्र 99 परसेंटाइल या उससे ऊपर अंक ले आते हैं, तो बाकी सभी को निराशा का सामना करना पड़ता है।
यह केवल संख्या का खेल नहीं है। जो छात्र 99 परसेंटाइल लाता है, वह देश के शीर्ष 1 प्रतिशत छात्रों में शामिल होता है। लेकिन फिर भी उसे किसी अन्य कॉलेज में जाना पड़ता है। यह स्थिति न केवल छात्रों के लिए दुःखद है, बल्कि पूरी शिक्षा व्यवस्था पर ही सवाल खड़े करती है। माता-पिता का विश्वास टूटता है। छात्र का आत्मविश्वास डिगता है। और समाज के लिए प्रतिभाओं की बर्बादी होती है।
कोचिंग का बढ़ता खर्च: एक भारी बोझ
कोचिंग का खर्च अब इतना बढ़ गया है कि मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए यह सपना देखना ही मुश्किल हो गया है। दिल्ली, मुंबई और बेंगलुरु जैसे शहरों में प्रमुख कोचिंग संस्थान 25 लाख रुपये तक फीस ले रहे हैं। यह आंकड़ा बेहद अनुचित है। एक सामान्य भारतीय परिवार की वार्षिक आय ही 3-5 लाख रुपये होती है, और यहां एक ही परीक्षा की तैयारी पर 25 लाख खर्च हो जाता है।
इसका मतलब यह है कि अमीर माता-पिता के बच्चों को सर्वश्रेष्ठ शिक्षकों, अच्छी पढ़ाई की सामग्री और व्यक्तिगत मार्गदर्शन मिलता है। जबकि गरीब और मध्यमवर्गीय छात्रों को इन सुविधाओं से वंचित रहना पड़ता है। इससे असमानता बढ़ती है और योग्यता का सही मूल्यांकन नहीं हो पाता।
कई कोचिंग संस्थान अतिरिक्त शुल्क के नाम पर अलग-अलग सेवाएं प्रदान कर रहे हैं। ऑनलाइन क्लास, डाउट क्लीयरिंग सेशन, मॉक टेस्ट, व्यक्तिगत परामर्श - सब कुछ का अलग शुल्क है। यह व्यवस्था शिक्षा को एक वस्तु बना देती है, जहां पैसा ही सब कुछ है।
समस्या का समाधान क्या है?
इस गंभीर समस्या का समाधान खोजना अत्यंत जरूरी है। सरकार को चाहिए कि वह कोचिंग संस्थानों पर सख्त नियंत्रण लगाए। फीस की एक सीमा निर्धारित करनी चाहिए ताकि मध्यमवर्गीय परिवार भी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का लाभ ले सकें।
दूसरा, आईआईटी की सीटों में वृद्धि करनी चाहिए। वर्तमान में केवल 16 हजार सीटें हैं, जबकि योग्य छात्रों की संख्या लाखों में है। यदि सीटें बढ़ाई जाएं, तो अधिक छात्रों को आईआईटी में प्रवेश का मौका मिल सकता है।
तीसरा, स्कूली शिक्षा में सुधार लाना चाहिए। यदि 11वीं और 12वीं में ही गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिले, तो कोचिंग की आवश्यकता कम हो जाएगी। सरकारी स्कूलों में अच्छे शिक्षकों की नियुक्ति करनी चाहिए और उन्हें उचित वेतन देना चाहिए।
चौथा, परीक्षा प्रणाली को ही बदलना चाहिए। एक ही परीक्षा पर सारा दारोमदार न रहे। बहु-स्तरीय मूल्यांकन प्रणाली अपनानी चाहिए जहां स्कूल की परीक्षाएं, प्रोजेक्ट और व्यावहारिक कौशल को भी महत्व दिया जाए।
पांचवां, छात्रों को मानसिक सहायता देने के लिए स्कूलों में काउंसलर नियुक्त करने चाहिए। कई छात्र तनाव के कारण आत्महत्या करते हैं। इस प्रवृत्ति को रोकना जरूरी है।
निष्कर्ष
आईआईटी एक प्रतिष्ठित संस्थान है, लेकिन इसकी प्रवेश परीक्षा अब बेहद प्रतिस्पर्धी और महंगी हो गई है। 99 परसेंटाइल वाले छात्र को भी आईआईटी नहीं मिल पा रहा है, और 25 लाख का खर्च एक सामान्य परिवार के लिए असंभव है। यह स्थिति अस्वीकार्य है। समाज, सरकार और शिक्षा संस्थानों को इस समस्या का गंभीरता से सामना करना चाहिए। केवल धनवान छात्रों के लिए नहीं, बल्कि सभी योग्य छात्रों के लिए समान अवसर सुनिश्चित करना चाहिए। भारत का भविष्य इसी पर निर्भर करता है।




