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Friday, 17 July 2026
व्यापार

KG फीस 2.25 लाख सालाना, आम आदमी की कमाई से ज्यादा

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Komal
संवाददाता
📅 22 April 2026, 7:46 AM ⏱ 1 मिनट 👁 1.0K views
KG फीस 2.25 लाख सालाना, आम आदमी की कमाई से ज्यादा
📷 aarpaarkhabar.com

केजी क्लास की फीस को लेकर सोशल मीडिया पर एक बार फिर बवाल मच गया है। दिल्ली के एक सॉफ्टवेयर डेवलपर ने अपने बच्चे की केजी क्लास की फीस रसीद शेयर की है जिसमें सालाना 2.25 लाख रुपये की रकम का जिक्र है। इस पोस्ट के बाद से सोशल मीडिया पर भारी बहस शुरू हो गई है। लोग सवाल उठा रहे हैं कि आखिर आम आदमी अपने बच्चों को इतनी महंगी शिक्षा कैसे दे सकते हैं। यह मामला महज एक स्कूल की फीस नहीं है, बल्कि भारत की शिक्षा व्यवस्था की एक बड़ी विसंगति को दर्शाता है।

प्राइवेट स्कूलों की बढ़ती फीस का संकट

भारत में प्राइवेट स्कूलों की फीस में पिछले कुछ सालों में अप्रत्याशित इजाफा हुआ है। दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु और अन्य महानगरों में शीर्ष स्कूलों की सालाना फीस 3 से 5 लाख रुपये तक पहुंच गई है। इसमें किताबें, स्कूल ड्रेस, परिवहन और अतिरिक्त गतिविधियों का खर्च अलग से आता है। कई स्कूलों में दाखिले के समय 5 से 10 लाख रुपये तक का डेवलपमेंट चार्ज भी लेते हैं। यह दरें आम भारतीय परिवार के लिए अक्षम्य हो गई हैं।

शिक्षा मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि बचपन की शिक्षा बहुत महत्वपूर्ण होती है, लेकिन यह शिक्षा सभी के बच्चों को समान गुणवत्ता के साथ मिलनी चाहिए। जब एक ओर सरकारी स्कूलों में संसाधनों की कमी है और दूसरी ओर प्राइवेट स्कूलें मनमानी फीस वसूल रहे हैं, तो शिक्षा को लेकर समाज में विषमता बढ़ रही है। यह पूरी व्यवस्था ही सवालों के घेरे में आ गई है।

आम आदमी की कमाई बनाम स्कूल की फीस

राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन के अनुसार, भारत में एक औसत परिवार की मासिक आय लगभग 30,000 से 40,000 रुपये है। कई परिवारों की आय इससे भी कम है। ऐसे में जब एक बच्चे की केजी क्लास की सालाना फीस 2.25 लाख रुपये हो तो यह पूरे परिवार के बजट को तबाह कर देती है। माता-पिता को यह मुश्किल विकल्प का सामना करना पड़ता है कि अपने बच्चे को प्राइवेट स्कूल में डालें या अन्य जरूरी खर्चों को पूरा करें।

यह आर्थिक असंतुलन भारतीय समाज को गहराई से प्रभावित कर रहा है। मध्यवर्गीय परिवार अपने बचे-खुचे संसाधनों को शिक्षा में झलक देते हैं, लेकिन फिर भी मंहगे स्कूलों के आगे वे लाचार रह जाते हैं। सोशल मीडिया पर इस विषय पर जो बहस चल रही है, उससे पता चलता है कि आम जनता इस व्यवस्था से गहरी असंतुष्टि महसूस कर रही है।

दिल्ली के सॉफ्टवेयर डेवलपर की पोस्ट के कमेंट में एक माता ने लिखा कि वह अपने बच्चे को सरकारी स्कूल में डालने के लिए मजबूर हो गई है क्योंकि प्राइवेट स्कूलें उनकी पहुंच से बाहर हैं। एक अन्य कमेंट में कोई व्यक्ति लिखता है कि उसके परिवार की पूरी सालाना कमाई इससे कम है। ये बातें दर्शाती हैं कि शिक्षा की दुनिया में कितनी बड़ी खाई बन गई है।

सरकार और नियामक निकायों की जिम्मेदारी

भारत सरकार और विभिन्न राज्य सरकारों को इस मुद्दे पर तत्काल ध्यान देना चाहिए। केंद्रीय शिक्षा नीति में निजी स्कूलों की फीस को नियंत्रित करने के प्रावधान हैं, लेकिन व्यवहार में ये सख्ती से लागू नहीं हो रहे। कई राज्यों में स्कूल फीस निर्धारण आयोग हैं, परंतु उनके निर्देशों का पालन न करने के खिलाफ कोई कड़ी कार्रवाई नहीं होती। प्राइवेट स्कूलें अपनी मनमानी फीस वसूल करते हैं और अधिकारी मौन बैठे रहते हैं।

इसके अलावा, सरकारी शिक्षा के प्रति निवेश में भी कमी देखी जा रही है। कई सरकारी स्कूलों में न तो उचित भवन है और न ही शिक्षकों की संख्या पर्याप्त है। जब सरकारी स्कूल इतने निकृष्ट होंगे तो माता-पिता अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूलों में डालने के लिए मजबूर होंगे, भले ही उन्हें कर्ज लेना पड़े। यह एक दुष्चक्र है जो सरकार की लापरवाही से बना है।

शिक्षा को सभी के लिए सुलभ बनाना न केवल सामाजिक दायित्व है, बल्कि राष्ट्रीय हित के लिए भी आवश्यक है। जब शिक्षा महंगी होगी तो गरीब और मध्यवर्गीय परिवारों के बच्चे शिक्षा से वंचित रह जाएंगे। इससे समाज में असमानता बढ़ेगी और आर्थिक विषमता गहरी होगी। सरकार को चाहिए कि निजी स्कूलों की मनमानी पर लगाम कसे और सरकारी शिक्षा को मजबूत बनाए। तभी सच में भारत के सभी बच्चों को समान शिक्षा का अधिकार मिल सकेगा।