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Wednesday, 20 May 2026
विश्व

होर्मुज में ईरान की समुद्री बारूदी सुरंगें

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Komal
संवाददाता
📅 12 April 2026, 6:15 AM ⏱ 1 मिनट 👁 1.1K views
होर्मुज में ईरान की समुद्री बारूदी सुरंगें
📷 aarpaarkhabar.com

ईरान और इजराइल के बीच चल रहे युद्ध में होर्मुज जलडमरूमध्य एक गंभीर समस्या बन गया है। यह विश्व के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक है, जहां से दुनिया का तीस प्रतिशत तेल आता है। लेकिन इस समय यह जलडमरूमध्य खतरनाक बारूदी सुरंगों से भरा हुआ है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि ये बारूदी सुरंगें ईरान ने ही बिछाई हैं, लेकिन वह अब उन्हें हटा नहीं पा रहा है।

पाकिस्तान के इस्लामाबाद में ईरान और अमेरिका के बीच शांति वार्ता चल रही है। इन बातचीत के दौरान होर्मुज की स्थिति को लेकर गंभीर चिंताएं व्यक्त की जा रही हैं। हालांकि दोनों पक्ष एक-दूसरे से समझौते की ओर बढ़ रहे हैं, लेकिन समुद्री सुरक्षा का मुद्दा अभी भी जटिल बना हुआ है। अंतर्राष्ट्रीय मीडिया की रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरान की नौसेना के पास इन सभी बारूदी सुरंगों को हटाने की क्षमता और संसाधन नहीं रह गए हैं।

होर्मुज जलडमरूमध्य की महत्ता

दुनिया की अर्थव्यवस्था के लिए होर्मुज जलडमरूमध्य कितना महत्वपूर्ण है, इसे समझने के लिए कुछ आंकड़ों पर नजर डालना जरूरी है। यह संकीर्ण जलडमरूमध्य ओमान की खाड़ी को फारस की खाड़ी से जोड़ता है। इसी रास्ते से सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत, ईरान और इराक का तेल निर्यात होता है। विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार, पूरी दुनिया का लगभग तीस प्रतिशत समुद्री तेल इसी मार्ग से गुजरता है। इसके अलावा, यहां से प्राकृतिक गैस का भी बड़ा हिस्सा व्यापार होता है।

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, यह जलडमरूमध्य प्रतिदिन लगभग 21 मिलियन बैरल तेल के परिवहन के लिए जिम्मेदार है। यदि इस रास्ते में कोई बाधा आती है, तो वैश्विक तेल की कीमतों में तेजी से वृद्धि हो सकती है। यही कारण है कि इस क्षेत्र में किसी भी प्रकार की अस्थिरता पूरी दुनिया के लिए चिंता का विषय बन जाती है। ईरान द्वारा बिछाई गई बारूदी सुरंगें इसी मार्ग की सुरक्षा को खतरे में डाल रही हैं।

ईरान की समुद्री बारूदी सुरंगों की समस्या

ईरान ने होर्मुज में कुल कितनी बारूदी सुरंगें बिछाई हैं, इसका सटीक आंकड़ा अभी तक सामने नहीं आया है। लेकिन अंतर्राष्ट्रीय समुद्री सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार, ईरान ने सैकड़ों बारूदी सुरंगें इस जलडमरूमध्य में लगाई हैं। ये सुरंगें विभिन्न गहराइयों पर रखी गई हैं, जिससे उन्हें निकालना और भी मुश्किल हो गया है।

ईरान की नौसेना के पास बारूदी सुरंगों को निकालने के लिए पर्याप्त उपकरण और प्रशिक्षित कर्मी नहीं हैं। युद्ध के कारण उसके संसाधन बहुत सीमित हो गए हैं। साथ ही, अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबंधों के कारण ईरान को उन्नत तकनीक और उपकरण खरीदने में भी कठिनाई आ रही है। ये सभी कारण मिलकर इस संकट को और भी गंभीर बना रहे हैं।

इंटरनेशनल मेरीटाइम ऑर्गनाइजेशन ने होर्मुज में बारूदी सुरंगों की वजह से शिपिंग कंपनियों को आगाह कर दिया है। कई जहाजों के मालिकों ने इस रास्ते से यातायात कम करना शुरू कर दिया है। इससे व्यापार मार्गों में बदलाव हो रहा है, जिससे परिवहन का खर्च बढ़ रहा है।

अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की चिंता और कूटनीतिक प्रयास

अमेरिका, यूरोपीय संघ, चीन और भारत सहित दुनिया की बड़ी शक्तियां इस स्थिति से बहुत चिंतित हैं। उन्होंने होर्मुज में नौकायन की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अपनी नौसेनाओं को तैनात किया है। अमेरिकी नौसेना नियमित रूप से इस क्षेत्र में गश्त लगा रही है। यूरोपीय देशों ने भी एक संयुक्त समुद्री गश्त दल गठित किया है।

इस बीच, इस्लामाबाद में चल रही शांति वार्ता इस समस्या को सुलझाने का एक महत्वपूर्ण मंच साबित हो सकती है। अमेरिका और ईरान दोनों को होर्मुज में बारूदी सुरंगों को हटाने पर सहमति तक पहुंचने का प्रयास करना चाहिए। यह न केवल दोनों देशों के लिए, बल्कि पूरी दुनिया के लिए लाभकारी होगा।

संयुक्त राष्ट्र महासचिव के कार्यालय ने भी इस मामले में हस्तक्षेप करने की तैयारी दिखाई है। वे होर्मुज में एक अंतर्राष्ट्रीय मिशन भेजने की योजना बना रहे हैं। इस मिशन का मुख्य उद्देश्य बारूदी सुरंगों को हटाने में तकनीकी सहायता प्रदान करना होगा। साथ ही, यह मिशन यह भी सुनिश्चित करेगा कि भविष्य में ऐसी घटना दोबारा न हो।

चीन और रूस जैसी बड़ी शक्तियां भी इस मुद्दे पर अपनी भूमिका निभा सकती हैं। वे ईरान को तकनीकी और वित्तीय सहायता प्रदान कर सकते हैं। भारत ने भी इस मामले में अपनी चिंता व्यक्त की है, क्योंकि भारतीय व्यापार का एक बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है।

होर्मुज जलडमरूमध्य में ईरान की बारूदी सुरंगें एक बहुत बड़ी समस्या बन गई हैं। इस समस्या को सुलझाने के लिए सभी पक्षों को एक-दूसरे के साथ मिलकर काम करना होगा। केवल सहयोग और कूटनीति के माध्यम से ही इस संकट से निपटा जा सकता है। वर्तमान में इस्लामाबाद में चल रही बातचीत एक सकारात्मक कदम है, और इसी दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।