वट सावित्री व्रत 2026: पूजन मुहूर्त और कथा
वट सावित्री व्रत सिर्फ एक परंपरा नहीं बल्कि अटूट प्रेम, विश्वास और समर्पण का प्रतीक है। इस पवित्र दिन महिलाएं कठोर व्रत रखकर अपने दांपत्य जीवन की खुशहाली और पति की लंबी उम्र की कामना करती हैं। शास्त्रों में इसका विशेष महत्व बताया गया है। जयेष्ठ माह के कृष्ण पक्ष की अमावस्या को मनाया जाने वाला यह व्रत हजारों सालों से भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग रहा है। इस बार वट सावित्री व्रत का मुहूर्त आज सुबह 5 बजे के आसपास शुरू हो चुका है।
यह व्रत मुख्य रूप से उत्तर और मध्य भारत में बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। विवाहित महिलाएं इस दिन को अपने लिए सबसे महत्वपूर्ण मानती हैं। पति की दीर्घायु और कुशलक्षेम के लिए महिलाएं पूरे दिन निर्जल व्रत रखती हैं। माना जाता है कि इस व्रत को करने से विवाहित जीवन सुख और समृद्धि से भर जाता है। साथ ही, पति की रक्षा होती है और घर में खुशियां आती हैं।
वट सावित्री व्रत का महत्व और इतिहास
वट सावित्री व्रत की कथा बहुत प्राचीन और प्रेरणादायक है। पौराणिक कथाओं में सावित्री और सत्यवान की प्रेम कहानी बेहद मशहूर है। सावित्री एक राजकुमारी थीं जिनके पिता ने उनके लिए एक उपयुक्त दूल्हा खोजने का प्रयास किया। सावित्री स्वयं अपनी पसंद से सत्यवान को चुना, जो एक गरीब परिवार के लड़के थे।
सत्यवान को यम का शाप था कि वह केवल एक वर्ष के लिए जीवित रहेंगे। लेकिन सावित्री की भक्ति, प्रेम और समर्पण ने यम को भी प्रभावित किया। शास्त्रों के अनुसार सावित्री अपने पति के साथ यम के पास गईं और अपनी बुद्धिमानी से यम को शाप मुक्त करवाया। यम ने सावित्री की निष्ठा और प्रेम से प्रसन्न होकर सत्यवान को पुनः जीवन दान दिया।
यही कारण है कि सावित्री को पत्नी का आदर्श माना जाता है। उनकी निष्ठा, धैर्य और समर्पण की कथा पीढ़ियों से चली आ रही है। महिलाएं इसी व्रत के माध्यम से सावित्री की तरह अपने पति के लिए समर्पण और प्रेम दिखाती हैं। वट सावित्री व्रत का मुहूर्त प्रत्येक वर्ष जयेष्ठ माह की अमावस्या को आता है।
पूजन विधि और शुभ मुहूर्त
वट सावित्री व्रत का पूजन करने के लिए एक विशेष विधि है। इस वर्ष व्रत का शुभ मुहूर्त सुबह 5 बजे के करीब शुरू हो गया है। महिलाओं को सूर्योदय से पहले ही व्रत का संकल्प लेना चाहिए। पूजन की तैयारी के लिए घर को पहले से साफ-सुथरा कर लिया जाता है।
व्रत की पूजा के लिए वट वृक्ष के पास जाना परंपरागत है। वट के पेड़ को भारतीय संस्कृति में पवित्र माना जाता है। महिलाएं वट के पेड़ के चारों ओर धागा लपेटती हैं और दीप जलाती हैं। साथ ही वट के पेड़ को जल से नहलाया जाता है और उसे फल, फूल और खीर का भोग लगाया जाता है।
पूजन के समय महिलाओं को सावित्री की कथा सुनी या पढ़ी जाती है। घर में बड़ी महिलाएं छोटी महिलाओं को यह कथा सुनाती हैं। पूजन के बाद व्रत खोला जाता है। व्रत को खोलने से पहले घर के बड़े-बुजुर्गों का आशीर्वाद लिया जाता है। माना जाता है कि इस दिन का पूजन सच्चे मन से किया जाए तो सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं।
व्रत की कथा और आध्यात्मिक महत्व
वट सावित्री व्रत की कथा अत्यंत हृदयस्पर्शी है। इसमें सावित्री की पातिव्रत्य की महिमा का वर्णन है। कहा जाता है कि सावित्री अपने पति के लिए इतनी समर्पित थीं कि वह यम को भी प्रभावित कर सकीं। यह कहानी हर पत्नी के लिए प्रेरणा का स्रोत है।
आध्यात्मिक दृष्टि से भी यह व्रत बहुत महत्वपूर्ण है। इस व्रत के माध्यम से महिलाएं अपने आंतरिक शक्ति को जागृत करती हैं। निर्जल व्रत रखने से मन को शांति मिलती है और आत्मबल बढ़ता है। पति के लिए की जाने वाली प्रार्थना और भक्ति मन को पवित्र करती है।
वट सावित्री व्रत केवल एक धार्मिक कर्तव्य नहीं है बल्कि एक संस्कार है। यह व्रत परिवार के सदस्यों के बीच प्रेम और विश्वास को मजबूत करता है। इस दिन सभी महिलाएं एक दूसरे को सुख और समृद्धि की कामना करती हैं। यह परंपरा भारतीय समाज की नींव है और आने वाली पीढ़ियों को मजबूत रखती है।




