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Tuesday, 19 May 2026
विश्व

कमजोर मानसून और गर्मी से कृषि संकट

author
Komal
संवाददाता
📅 03 May 2026, 5:45 AM ⏱ 1 मिनट 👁 1.1K views
कमजोर मानसून और गर्मी से कृषि संकट
📷 aarpaarkhabar.com

भारत के कृषि क्षेत्र के लिए आने वाले समय में एक बड़ी चुनौती खड़ी होने वाली है। भारतीय मौसम विभाग की ताजा चेतावनी के अनुसार 2026 में कमजोर मानसून और भीषण गर्मी का खतरा बना हुआ है। यह स्थिति देश की कृषि व्यवस्था पर गंभीर संकट ला सकती है। विश्व मौसम संगठन डब्ल्यूएमओ की रिपोर्ट से पता चल रहा है कि इस साल मानसून का स्वरूप काफी असंतुलित रहने वाला है। एक तरफ लंबे समय तक सूखे की स्थिति रहेगी तो दूसरी तरफ कम समय में भारी बारिश होने की संभावना है।

भारतीय किसान परिवार इस समय काफी चिंतित हैं। खरीफ सीजन आने वाला है और यदि मानसून कमजोर रहता है तो सोयाबीन, कपास, मक्का और दूसरी फसलों को नुकसान का सामना करना पड़ेगा। मौसम विभाग के विशेषज्ञों का कहना है कि इस साल की गर्मी रिकॉर्ड तोड़ सकती है। राजस्थान, महाराष्ट्र, गुजरात और उत्तरी भारत के क्षेत्रों में सबसे ज्यादा खतरा है। पिछले साल भी देश ने कमजोर मानसून का सामना किया था जिससे कई राज्यों में सूखे जैसी स्थिति बन गई थी।

मौसम विभाग का अनुमान और चेतावनी

विश्व मौसम संगठन ने अपनी ताजा रिपोर्ट में चेतावनी दी है कि दक्षिण एशिया में आने वाले महीनों में अधिकतम और न्यूनतम दोनों तापमान सामान्य से ऊपर रहेंगे। मई और जून के महीनों में तापमान 45 डिग्री सेल्सियस से अधिक हो सकता है। उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्रों में ताप लहर की स्थिति बनी रहेगी। भारतीय मौसम विभाग के निदेशक ने कहा है कि मानसून के आने में भी देरी हो सकती है। सामान्य तौर पर मानसून 1 जून को केरल पहुंचता है लेकिन इस बार यह 10-15 जून के बाद आ सकता है।

एल नीनो प्रभाव इस बार काफी मजबूत दिख रहा है जिससे मानसून की गति प्रभावित हो सकती है। हिंद महासागर का तापमान सामान्य से ज्यादा गर्म है। यह स्थिति मानसून को कमजोर करने में मुख्य भूमिका निभा सकती है। पिछले कुछ दशकों में जब भी एल नीनो प्रभाव रहा है, भारत में मानसून कमजोर हुआ है और सूखे जैसी परिस्थितियां बनी हैं। मौसम विज्ञानियों का कहना है कि इस बार की स्थिति 2014-15 जैसी हो सकती है जब भारत को भीषण सूखे का सामना करना पड़ा था।

कृषि पर पड़ने वाले असर और किसानों की चिंता

भारतीय कृषि वर्षा पर 80 प्रतिशत निर्भर है। कमजोर मानसून का मतलब है कि सिंचित क्षेत्रों को छोड़कर शेष क्षेत्रों में खरीफ फसलें बुरी तरह प्रभावित होंगी। देश के 60 प्रतिशत से अधिक कृषि क्षेत्र वर्षा पर निर्भर हैं। महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश और कर्नाटक जैसे राज्यों में सबसे ज्यादा सूखे की संभावना है। इन राज्यों में सोयाबीन, कपास और दालों की खेती होती है।

किसान संगठनों ने सरकार से तुरंत कदम उठाने की मांग की है। वे कहते हैं कि अगर अभी से तैयारी नहीं की गई तो लाखों किसान कर्ज में डूब जाएंगे। बीज, खाद और पानी की व्यवस्था के लिए तत्काल पहल आवश्यक है। सरकार को न्यूनतम समर्थन मूल्य में वृद्धि करनी चाहिए और फसल बीमा योजना को और प्रभावी बनाना चाहिए। कई राज्य सरकारें पहले से ही सूखा राहत के लिए धनराशि बढ़ाने की बात कर रही हैं।

जल संरक्षण भी एक महत्वपूर्ण पहलू है। कमजोर मानसून की स्थिति में जलाशयों का स्तर कम रहेगा। तालाबों और कुओं की खोदाई के लिए सरकारी योजनाएं चलाई जा रही हैं। इसके अलावा, ड्रिप इरिगेशन और स्प्रिंकलर सिंचाई को बढ़ावा देना होगा ताकि कम पानी में ज्यादा उपज मिल सके। सरकार ने 2026-27 के बजट में जल संरक्षण के लिए 500 करोड़ रुपये का आवंटन किया है।

भविष्य की रणनीति और समाधान

लंबी अवधि के समाधान के रूप में किसानों को बेहतर बीज, सूखा सहन करने वाली फसलें उगाने के लिए प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। बाजरा, ज्वार और उड़द जैसी फसलें कम पानी में भी अच्छी पैदावार देती हैं। सरकार को इन फसलों की खेती को बढ़ावा देना चाहिए। जैविक खेती भी एक विकल्प है जो मिट्टी की नमी को बनाए रखने में मदद करती है।

कृषि वैज्ञानिकों का सुझाव है कि खेतों में मल्चिंग की जाए जिससे मिट्टी की नमी बनी रहे। फसलें बदलने की प्रणाली को अपनाने से भी मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है। कई राज्यों में सरकार किसानों को नई तकनीकें सिखाने के लिए कृषि विज्ञान केंद्र खोल रही है। पानी की बचत के लिए भी सरकार पाइपलाइन के माध्यम से सिंचाई को बढ़ावा दे रही है।

मौसम विभाग ने किसानों को सलाह दी है कि अपने खेतों की तैयारी अभी से ही शुरू कर दें। जल संरक्षण के तरीके अपनाएं और कमजोर मानसून के लिए वैकल्पिक फसलें तैयार रखें। सरकार के साथ मिलकर काम करें और सभी उपलब्ध योजनाओं का लाभ उठाएं। इस समय किसानों की एकता और सरकार की सहानुभूति दोनों ही जरूरी हैं ताकि कृषि संकट को कम किया जा सके।

भारत की खाद्य सुरक्षा के लिए भी यह समय काफी महत्वपूर्ण है। देश की बढ़ती आबादी को खाना खिलाने के लिए कृषि उत्पादन को बनाए रखना होगा। इसलिए सभी को मिलकर इस संकट से निपटने के लिए तैयार रहना चाहिए।