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Tuesday, 19 May 2026
शिक्षा

61 साल की महिला ने पास की 10वीं, 77 प्रतिशत अंक

author
Komal
संवाददाता
📅 14 May 2026, 6:17 AM ⏱ 1 मिनट 👁 1.2K views
61 साल की महिला ने पास की 10वीं, 77 प्रतिशत अंक
📷 aarpaarkhabar.com

पंजाब के जालंधर शहर में एक ऐसी घटना हुई है जो न केवल पूरे शहर में बल्कि देश भर में प्रेरणा का संदेश दे रही है। 61 वर्षीय नरेंद्र कौर ने दसवीं कक्षा की परीक्षा पास कर एक ऐसा कीर्तिमान स्थापित किया है जो किसी भी उम्र के इंसान को सीखने के लिए प्रेरित कर सकता है। उन्होंने शहीद भाई तारा सिंह खालसा ओपन स्कूल से 650 में से 500 अंक हासिल किए हैं, जो 77 प्रतिशत के बराबर है। यह उपलब्धि केवल एक परीक्षा पास करना नहीं है, बल्कि यह जीवन के प्रति एक अलग ही दृष्टिकोण को दर्शाती है।

नरेंद्र कौर की यह यात्रा बेहद प्रेरणादायक है। उन्होंने बताया कि उनकी शादी तब हुई थी जब वे अपनी पढ़ाई के दौरान ही थीं। शादी के समय उनकी पढ़ाई रुक गई थी क्योंकि उस समय के समाज में महिलाओं की शिक्षा को लेकर अलग ही सोच थी। घर-परिवार की जिम्मेदारियों में वे पूरी तरह डूब गईं। लेकिन जो बात उन्हें अलग बनाती है वह है सीखने की अदम्य इच्छा जो उनके मन में सदा जलती रही। वे कभी नहीं भूलीं कि शिक्षा कितनी महत्वपूर्ण है।

जब उनके बेटे अमेरिका और कनाडा में जाने लगे, तब उनके परिवार के सदस्यों ने उन्हें प्रोत्साहित किया कि वे अपनी शिक्षा फिर से शुरू करें। परिवार का यह सहयोग और समर्थन ही नरेंद्र कौर की इस यात्रा का मूल आधार रहा। उन्होंने अपने परिवार की प्रेरणा से दोबारा पढ़ाई शुरू करने का निर्णय लिया। यह निर्णय लेना आसान नहीं था क्योंकि उनकी उम्र में कई लोग सीखने को अपने लिए अप्रासंगिक मानते हैं। लेकिन नरेंद्र कौर के लिए उम्र कभी बाधा नहीं बनी।

शिक्षा के प्रति अटूट संकल्प

नरेंद्र कौर के इस सफर को देखते हुए यह बिल्कुल स्पष्ट हो जाता है कि शिक्षा के प्रति उनका प्रेम कितना गहरा है। शहीद भाई तारा सिंह खालसा ओपन स्कूल में दाखिला लेकर उन्होंने एक बहुत साहसिक कदम उठाया। ओपन स्कूल में बहुत सारे छात्र होते हैं जो अलग-अलग उम्र के होते हैं। ऐसे में एक 61 साल की महिला का दसवीं की परीक्षा में बैठना और वह भी इतने अच्छे अंकों से पास होना, यह सच में अभूतपूर्व है। 77 प्रतिशत अंक केवल एक संख्या नहीं है, यह उनकी मेहनत, लगन और दृढ़ निश्चय का प्रमाण है।

जब हम समाज में महिला शिक्षा के बारे में बात करते हैं, तो हम अक्सर युवा लड़कियों की बात करते हैं। लेकिन नरेंद्र कौर ने यह दिखा दिया है कि शिक्षा का कोई उम्र नहीं होता। महिला सशक्तिकरण केवल आर्थिक आत्मनिर्भरता नहीं है, बल्कि शिक्षा के माध्यम से आत्मविश्वास और स्वावलंबन भी है। जब एक महिला किसी भी उम्र में पढ़ाई कर सकती है, तो इसका मतलब यह है कि कोई भी बाधा अंतिम नहीं है।

परिवार का सहयोग और भविष्य की योजनाएं

नरेंद्र कौर के परिवार की सकारात्मक सोच उनकी सफलता के पीछे की सबसे बड़ी ताकत है। उनके बेटे अमेरिका और कनाडा में हों, फिर भी परिवार के सदस्यों ने उन्हें प्रोत्साहित किया। यह परिवार का वह रवैया है जो समाज को बदलता है। घर में अगर महिलाओं को शिक्षा के लिए प्रोत्साहन मिले, तो कोई भी उन्हें रोक नहीं सकता। नरेंद्र कौर का यह उदाहरण हर घर में जाना चाहिए ताकि अन्य परिवार भी अपनी महिलाओं को शिक्षा की सीढ़ी चढ़ने के लिए प्रोत्साहित करें।

सबसे खूबसूरत बात यह है कि नरेंद्र कौर इसके साथ नहीं रुकना चाहती हैं। 10वीं पास करने के बाद वे अब 12वीं करना चाहती हैं और उसके बाद स्नातक डिग्री भी हासिल करना चाहती हैं। यह उनके सीखने की इच्छा को दर्शाता है। 61 साल की उम्र में जब अधिकतर लोग अपने जीवन को ठप्प मान लेते हैं, वे आगे बढ़ने की योजना बना रही हैं। यह साहस, यह संकल्प ही तो असली शिक्षा है।

समाज के लिए सीख और प्रेरणा

नरेंद्र कौर की कहानी एक बहुत बड़ा संदेश देती है समाज को। यह कहानी बताती है कि उम्र कभी बाधा नहीं होती जब मन में सीखने की इच्छा हो। यह कहानी समाज के उस हिस्से को आईना दिखाती है जो लड़कियों को स्कूल भेजने में संकोच करते हैं। यह कहानी माता-पिता को सीख देती है कि बेटियों को शिक्षित करना कितना महत्वपूर्ण है। यह कहानी सभी महिलाओं को बताती है कि आपका भविष्य आपके हाथ में है, चाहे आप किसी भी उम्र में हों।

जालंधर की नरेंद्र कौर की यह उपलब्धि केवल एक व्यक्तिगत सफलता नहीं है, बल्कि यह एक सामाजिक आंदोलन है। यह दिखाता है कि शिक्षा का दायरा कितना व्यापक हो सकता है। हर आयु वर्ग के लोगों के लिए शिक्षा सुलभ होनी चाहिए। अगर हम सच में एक शिक्षित समाज बनाना चाहते हैं, तो हमें नरेंद्र कौर जैसे लोगों को सम्मान देना चाहिए और उनके मार्ग पर चलना चाहिए। उनकी जीवन यात्रा हर किसी को यह सिखाती है कि सीखने में कोई देर नहीं होती और कोई भी आयु सीमा नहीं होती।